Monday, January 9, 2017

नए साल की शुभकामनायें --

भाग १ :

गुजर गया एक और साल , जाते जाते कर गया क्या हाल।
कल तक जो मालामाल थे , वो एक पल में हो गए कंगाल।

नीले नोटों का रंग बदला , लोगों के जीने का ढंग बदला।
नींद उड़ गई अमीरों की , पर मौज करने लगा हर कंगला।

लोग रिक्शा छोड़ कतार में लग गए , पैसे के व्यापार में लग गए।
दिन भर खड़े रहे बैंक के सामने , फिर ठेके की कतार में लग गए।

मोदी ने नोटों का ऐसा दांव लगाया , पस्त हो गई ममता माया।
नर्म पड़ गए नितीश मुलायम , पर धरती हिली ना भूकंप आया।


पंजाब को सरे आम लूट गई भंग , सिद्धू का भाजपा से छूट गया संग ,
साल भर आप से लड़ते रहे नज़ीब , फिर खुद मैदान छोड़ गए जंग।

पठानकोट में चूक हो गई ज़रा सी , बड़ी दर्दनाक घटना थी उरी की।
किसी आतंकी को ना लगी फांसी , पर केजरी की ठीक हो गई खांसी।

विजेंद्र ने कईयों के घमंड किये चूर , हिंदी फिल्मों ने भी कमाया भरपूर।
पाकिस्तानी एक्टर्स तो भागे दुम दबा के , पर सैफीना को हो गया तैमूर।

रागा मोदी राग गाता रह गया ,  करण का यौवन आंसुओं में बह गया ,
अरबाज़ को छोड़ गई मलाईका , सलमान इस साल भी कुंवारा रह गया।

न्यू इयर पर होटलों को हुआ घाटा , कलाकारों ने अपना रेट आधा काटा ,
मिस्त्री की समझ ना आई मिस्ट्रि , क्यों टाटा ने सायरस को किया टाटा।  

आई एस आई एस की ज़ारी रही बर्बादी , अभी वश में नहीं आया बगदादी ,
पर अमेरिका ने हिला कर रख दिया , जब ट्रम्प ने हिलेरी की वाट लगा दी।

ऑलम्पिक्स में मैडल जीते कई रंग के , कुश्ती में साक्षी मलिक के बजे डंके ,
आमिर खान ने सहिष्णु होकर दिया नारा , म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के।

अभी भी जिन लोगों के चेहरे हैं उदास , सोचते हैं कि दिन तो पूरे हो गए पचास ,
उनको कहता हूँ, सोच बदलो, देश बदलेगा , मत सोचो मोदी जी फेल हुए या पास।

भाग २ :

कामना करता हूँ कि इस नए साल में सबके जीवन में :

हँसी के फुव्वारे हो , खुशी के गुब्बारे हो,

न आपसी विवाद हो, न कोई आतंकवाद हो !

और इस नए साल में मुक्ति मिले --

भूखों को भूख से ,घूसखोरों को घूस से ,

किसानो को कर्ज से , मरीजों को मर्ज से ,

गरीबों को कुपोषण से , शरीफों को शोषण से !

बाबुओं को फाइलों से, अस्पतालों को घायलों से ,

चुनाओं को फर्जी वोटों से , देश को नकली नोटों से !

और इस नए साल में , सलामत रहे--

बच्चों की मुस्कान, पंछियों की उड़ान,

फूलों के रंग, अपनों का संग,

बड़ों का दुलार, और भाई भाई का प्यार!

सलामत रहे--

देश की आज़ादी, वीरों के हौसले फौलादी,

लोकतंत्र में अटल विश्वास, और डिजिटल भारत की आस!

और कामना करता हूँ कि --

इस वर्ष ये नया साल , करदे दिलों का वो हाल,

कि ढह जायें सब मज़हब और नफरत की दीवारें,

और सर्व धर्म मिल कर पुकारें ,

मुबारक हो नया साल, सबको मुबारक हो नया साल!

जनता जब सुख चैन से सो पायेगी 
बेटियां भी जब सुरक्षित हो जाएँगी।    
इंसान में जब इंसानियत जाग जायेगी ,
नव वर्ष की कामना तभी शुभ हो पायेगी।     

Tuesday, December 27, 2016

ग़म भुलाने के लिए ---


जो लोग नोटबंदी से अत्यंत दुखी हैं , उनका ग़म भुलाने के लिए एक दर्द भरा गीत ( पैरोडी ) :

भाग एक :

जाने वो कैसे, लोग हैं जिनको, चौबीस हज़ार मिला ,
हमने तो जब , बस दस मांगे तो , दो ही हज़ार मिला।

बैंकों की राहें ढूंढी तो , लम्बी कतारें मिली ,
अपना जब नंबर आया तो, खिड़की बंद मिली।
जेब को खाली कर गया ,  अगला, दिन इतवार मिला ------

मुकर गया हर साथी देकर , खाली वादों का जाल ,
किसको फुरसत है जो समझे , हम दीनों का हाल।
हमको अपना पड़ोसी भी अक्सर , बीच कतार मिला -----

ये जीना भी कोई जीना है भैया , क्या खायें पीयेंगे ,
जेब में बिन पैसों के कैसे , शाम को ठेका जायेंगे।
काले धन से घबराना कैसा , पांच सौ ना हज़ार मिला -----

भाग दो :

जाने वो कैसे , लोग हैं जिनके , घर में भण्डार मिला ,
हमने तो जब , छापा मारा तो, बस भ्रष्टाचार मिला।

काले धन की , गड्डी ढूंढी तो , बोरी भर के मिली ,
तन के उजले थे , पर मन पर , काली गर्त मिली।
जनता का पैसा हज़्म कर गया, हमदर्द जो यार मिला ----

बिगड़ गया हर नेता लेकर , नोटों की सौगात ,
किसको चाहत है जो खाये , शैतानों से मात ।
जिसको समझा अपना वो ही , अक्सर बेजार मिला----

ना खाऊंगा ना खाने दूंगा , खाता हूँ ये कसम ,
अब चाहे जो भी हो जाये , होगा ना ही रहम ।
विरोधों से घबराना कैसा , जब लोगों का प्यार मिला -----


Monday, December 19, 2016

परिवर्तन तो अवश्यम्भावी है ---


सोच बदल रही है , देश बदल रहा है , आप माने या ना माने। हम यह जानते थे और रोज देखते थे कि कैसे हमारे देखते देखते युवा वर्ग की सोच बदल रही है।देश की लगभग आधी आबादी युवा वर्ग से बनती है। हम चाहे जितना मर्ज़ी जोर लगा लें , सोशल मीडिया पर बहस करते रहें , मोदी जी समेत नेताओं को भला बुरा कहते रहें, लेकिन यह सच है कि देश का भविष्य तो यह युवा वर्ग ही निर्धारित करेगा। और हिंदुस्तान टाइम्स के एक सर्वेक्षण ने यह साबित भी कर दिया।

इस सर्वेक्षण के अनुसार  :
* आधे से ज्यादा युवा देश में रहना नहीं चाहते क्योंकि उनको अपना भविष्य विदेशों में ज्यादा उज्जवल नज़र आता है।
* आधे से ज्यादा युवा शादी के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं। इसीलिए शिक्षित वर्ग में शादी की औसत आयु बढ़ती जा रही है।
* आधे से ज्यादा युवा सोचते हैं कि यदि शादी कर भी लें तो पुरानी पीढ़ी की तरह अंत तक चलने वाली नहीं लगती।
* आधे से ज्यादा युवा शादी से पहले यौन सम्बन्ध रखने में कोई बुराई नहीं समझते।
* आधे से ज्यादा युवा लिव इन रिलेशशिप में कोई बुराई नहीं समझते।
* आधे से ज्यादा अपने पार्टनर के प्रति फेथफुल रहना नहीं चाहते हैं।
* जबकि आधे से कुछ ही कम समलैंगिकता को बुरा नहीं समझते।
* आधे से कुछ ही कम अंतर्जातीय विवाह का अनुमोदन करते हैं।

यह सोच हमारे शहरी, सुशिक्षित , सभ्य समाज में रहने वाले उपरिगामी गतिशील युवा वर्ग की सोच है। और निश्चित ही इस सोच को बदला नहीं जा सकता। क्योंकि जिस तरह कोरे कागज़ पर तो रंग चढ़ा सकते हैं लेकिन रंगीन पर नहीं। कुम्हार कच्ची मिट्टी से ही मनचाहे बर्तन बना सकता है , आग में पकने के बाद नहीं। इसी तरह सांस्कारिक शिक्षा मासूम बच्चों को ही दी जा सकती है , शिक्षित युवाओं को नहीं। अब हमें इसी सोच के साथ जीना होगा , स्वीकार करना होगा और देश को बदलते देखना होगा।

वधु बिन शादी , शादी बिन प्यार ,
बिन शादी के लिव इन यार !
इस व्यवहार ने कर दी ,
संस्कार की , ऐसी की तैसी !    
     

Friday, December 16, 2016

नोटबंदी के दौर में श्री कृष्ण उवाच --


गीतानुसार दुनिया में तीन तरह की प्रवृति के लोग होते हैं -- सात्विक , राजसी और तामसी। यदि नोटबंदी के दौर में पैसे की दृष्टि से देखा जाये तो पैसे वाले अमीरों को इस तरह से परिभाषित किया जा सकता है :

१ ) सात्विक : व्यक्ति वे होते हैं जो अपने मेहनत से गुजर बसर करने के लिए पैसा कमाते हैं और सरकार को निर्धारित कर अदा कर देश निर्माण कार्य में योगदान कर अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं। आवश्यकताएं पूर्ण होने के बाद ये संतुष्टि का जीवन यापन करते हैं। लेकिन ऐसे अमीर योगी दुनिया में विरले ही होते हैं। गरीबों के पास तो पैसा ही नहीं होता , इसलिए उनको वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।

२ ) राजसी : ये दो तरह के होते हैं। एक वो जो पैसा तो मेहनत और ईमानदारी से कमाते हैं लेकिन सरकार को कर न देकर कर की चोरी करते हैं। इस श्रेणी में अधिकांश व्यापारी वर्ग के लोग आते हैं जो कमाते तो लाखों करोड़ों हैं लेकिन आय कर , बिक्री कर और वैट आदि भरने से बचते हैं। दूसरे राजसी लोग वे होते हैं जो पैसा सही गलत किसी भी ढंग से कमाकर अपनी तिजोरियां भरते रहते हैं। इस श्रेणी में वे लोग आते हैं जो रिस्वत या किकबैक से करोड़ों कमा लेते हैं या अचल संपत्ति बेचकर कैश को दबाये रहते हैं। ये लोग अपराधी किस्म के नहीं होते लेकिन वस्तुत: अपराध ही करते हैं , गैर कानूनी ढंग से पैसा कमाकर। इनमे मुख्यतया सरकारी अफ़सर , कुछ नेता लोग , प्रोपर्टी डीलर्स या पहुँच वाले सफेदपोश ज्यादा होते हैं।
दोनों ही किस्म के लोग लालची और स्वार्थी होते हैं क्योंकि इन्हें सिर्फ अपने पैसे से मतलब होता है , ये देश या किसी और के बारे में नहीं सोचते।

३ ) तामसी : प्रवृति के लोग आपराधिक प्रवृति के होते हैं जैसे चोर , डाकू , अपहरणकर्त्ता , तस्कर , जालसाज़ , सट्टेबाज़ , ड्रग्स स्मगलर्स , प्रोफेशनल हत्यारे आदि जो अपराध की दुनिया में रहकर पैसा तो कमा लेते हैं लेकिन उसका सुख कभी नहीं भोग पाते क्योंकि ये सदा कानून से भागते रहते हैं। इसलिए इनकी जिंदगी भी क्षणिक होती है और असमय ही ख़त्म हो जाती है।
लेकिन हमारे देश में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जिन्हें आम आदमी कहा जाता है। वे न तो अपराधी होते हैं , न अफसर , नेता या पहुँच वाले , न व्यवसायी और न ही इतना कमा पाते हैं कि उनके पास कभी ज़रुरत से ज्यादा पैसा हो। इन लोगों की जिंदगी अक्सर २ और ३ श्रेणी के लोगों द्वारा नियंत्रित और प्रभावित रहती है, एक कोल्हू के बैल की तरह। अक्सर यही वर्ग महंगाई से प्रभावित होता है । लेकिन शायद नोटबंदी से नहीं।


Tuesday, December 6, 2016

फोन पर नक्कालों से सावधान ---

यूँ ही बैठे ठाले , एक फोन के बाद :

मोबाईल पर जानी पहचानी रिंग टोन के बाद -- हैलो !
"हेल्लो , टी एस द -- र --ल जी बोल रहे हैं ? "
-- जी।
"जी मैं स्टेट बैंक से बोल रहा हूँ।"
यह सुनते ही कान खड़े हो गए , मन में बिजली सी कौंधी और हम चौकन्ने हो गये।  फिर शरारत सूझी तो हमने कहा -- हाँ भैया , का होयो ।
"जी स्टेट बैंक में आपका अकाउंट है ?"
--- जे तै पतौ ना भैया। पण गोरमेंट पिल्सण तौ भेजै है खात्ते में।
"आप डेबिट कार्ड इस्तेमाल करते हैं ? "
--- यो घिट पिट का होवै है भैया ? मोहे तौ पतौ ना।
"जी डेबिट कार्ड , जिससे ऐ टी एम मशीन से पैसे निकलते हैं।"
--- अच्छा अच्छा वो पिलास्टिक की पतरी। हाँ वो तौ लौंडा ले जा है अर मसीन में डालतै ई नोट बऱसण लग ज्यां। पण ईब तौ चलै ई ना।
"देखिये , आपका कार्ड ब्लॉक हो गया है।  आप जल्दी से उसे बदलवा लीजिये वरना बहुत पेनल्टी लग जाएगी। आप अपना कार्ड नंबर और पासवर्ड हमें बताइये , हम उसे अभी चालू कर देंगे।"
--- भैया ईब इस बुढ़ापा में तै अपणी बुढ़िया का नाम भी याद ना रहै , फिर कारड का लम्बर कैसे याद रह सकै। तू ठहर , मैं लौंडा कु बुला कै मंगवाऊँ हूँ। पण तू न्यू बता के तू कौण है अर कहाँ सू बोल रह्या है।  
"जी मैं स्टेट बैंक से बोल रहा हूँ।"
--- भैया रे , देस में तौ २९ इस्टेट हैंगे। तेरा कौण सौ इस्टेट बैंक है , न्यू बता ।
"जी , स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया।"
--- रै तू मनै बावला मति बणावै । इंडिया भारत नै ही तो कहैं हैं ना। आच्छा , ईब न्यू बता , तेरो नाम का है अर बैंक का पता का है ।
"जी मेरा नाम ----"
-- अरै रुक ज्या ससुर के नाती , न्यू याद न रहैगो , कागच पै लिखणा पड़ैगो।  अरै पप्पू , भैया मेरी कलम दवात तै दीज्यो।
पप्पू -- दद्दू , कलम तो ये रही लेकिन दवात में स्याही नहीं है।  वो मां ने नील समझ कर कपड़ों में डाल दी धोते समय।
--- अरै नासपिट्टे , तम उज्जड के उज्जड ही रहियो।  चल वो नई ल्या जै कल ल्यायो हौ।
"दद्दू , उसे तो पापा बैंक ले गये। लोगों की उंगली पर लगाने के लिए। "
--- सत्यानास हो थारा ,  कदी तौ दिमाग का इस्तेमाल कर लिया करो। ईब मैं काय से लिखूं , दिखै ना है बैंक सौ साब का फोन आयो है। अच्छा भैया , तम ऐसौ करो , तम नाम पतौ बोलो , हम फोन में ही रिकॉर्ड कर लेंग्गे। इरै कहौं है इसकौ रिकॉर्ड बटन।
उधर से तुरंत फोन कट।

नोट : जनहित में जारी।  

Thursday, November 17, 2016

इंसान का जीवन चक्र :


इंसान यदि गरीब घर में पैदा होता है तो इस बात की अत्यधिक सम्भावना रहती है कि वह जिंदगी भर रोजी रोटी कमाने में ही लगा रहेगा। यदि अमीर व्यवसायी घर में पैदा होता है तो इस बात की सम्भावना होती है कि वह जिंदगी भर कुछ न करते हुए भी ऐशो आराम में जिंदगी काटता रहेगा। लेकिन यदि आप आम मिडल क्लास फेमिली में पैदा हुए हैं तो आपके सामने एक मंज़िल होती है , पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करके , आम से खास बनने की।
ऐसे में आप पहले स्वयं अच्छी शिक्षा ग्रहण करते हैं , मेहनत करके किसी अच्छे प्रॉफेशन में प्रवेश कर अपना कॅरियर बनाते हैं और एक दिन ऊंचे मुकाम पर पहुँच जाते हैं। इस बीच आप शादी भी कर लेते हैं , बच्चे पैदा कर उनका लालन पालन और भी अच्छे से करते हैं। साथ ही घर में सभी आधुनिक सुविधाएँ जुटा पाने में समर्थ और सफल होते हैं।
अंत में यदि रिटायर होने से पहले आपने शहर में अपना अच्छा सा घर बना लिया है , बच्चे पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं , उनकी शादी कर आपने अपनी जिम्मेदारियां भी निपटा दी हैं , तो इसके बाद आपने जो भी धन जोड़ रखा है , वह फालतू और बेमतलब सा लगने लगता है। लेकिन भले ही खाने की भूख लगे या न लगे , फिर भी इंसान की पैसे की भूख नहीं मिटती। काले धन की बस यही कहानी है।
दफ़्तर जाना जब छूटा तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए !
तन पर दो वस्त्र हों और खाने को दो रोटी ,
फिर बस नीम्बू पानी चाहिए पीने के लिए !
नोटः काले धन पर पोस्ट्स की इतिश्री ! सभी को शुभकामनायें।

Monday, November 7, 2016

क्या भगवान भी दिल्ली वालों को किसी बात की सजा दे रहा है ...


एक बेहद ख़तरनाक़ यात्रा वृतांत :

यह इत्तेफ़ाक़ ही रहा कि दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदुषण वाले दिन हमें किसी काम से चंडीगढ़ / मोहाली जाना पड़ा। यूँ तो हमें लॉन्ग ड्राइव पर जाना सदा ही पसंद रहा है और गए हुए भी डेढ़ साल हो गया था।  लेकिन दिल्ली और हाइवेज पर फैली धुएं की चादर को देखकर हाइवे पर जाना बेहद खतरनाक हो सकता है , इसका आभास कई दिनों से अख़बारों में आने वाली ख़बरों से हमें भलि भांति था।  लेकिन काम की अत्यावश्यकता को देखते हुए जाना भी मज़बूरी ही थी। हालाँकि सुबह जाकर शाम तक वापस आना , एक ही दिन में खुद करीब ६००  किलोमीटर ड्राइव करना कोई आसान काम नहीं लगता। कोहरे की वजह से दृश्यता बहुत कम हो जाती है , और ऐसे में हाइवे ड्राइविंग बेहद खतरनाक हो जाती है।

इसलिए ज्यादा जल्दी न कर हम सुबह ७ बजे ही घर से निकले।  जैसा कि अनुमान था , जी टी रोड पर दिल्ली हरियाणा बॉर्डर तक काफी धुंधलका था लेकिन ड्राइव करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी।  लेकिन बॉर्डर पार करते ही , जैसे ही खुले खेतों के दर्शन हुए , धीरे धीरे धुंध बढ़ने लगी।  अब स्मॉग की जगह शुद्ध धुंध ने ले ली थी ।  सभी गाड़ियों वाले हेड लाइट्स और डिस्ट्रेस  सिग्नल ऑन कर चलने लगे। स्पीड कम होने लगी और दृष्टि भी। धुंध के झोंके गाड़ी की  ओर ऐसे आ रहे थे जैसे बारिश की बौछार आती हैं। कुछ समय बाद धुंध इतनी गहरी हो गई कि गाड़ी के शीशे के आगे भी कुछ नहीं दिख रहा था। दायीं लेन में चलते हुए साइड में डिवाइडर ज़रा सा दिख रहा था , जिसके सहारे हम धीरे धीरे गाड़ी चला पा रहे थे।  फिर एक के बाद एक एक्सीडेंट के नज़ारे दिखने लगे।

उस समय हमारी हालत बिलकुल उस पॉयलेट जैसी हो गई थी जिसने कुछ दिन पहले ज़ीरो विजिबलिटी में विमान को सिर्फ अंदाज़े से हवाई पट्टी पर उतार दिया था और कोई नुकसान नहीं हुआ था।  अब तो हमें यह भी लगने लगा था कि ऐसा ही रहा तो वापस कैसे आएंगे।  रात होना तो निश्चित था , फिर अँधेरा और धुंध दोनों मिलकर कहर ढा देंगे।  खैर किसी तरह धीरे धीरे लगभग रेंगते हुए साढ़े तीन घंटे में जब करनाल पहुंचे तो कुछ कुछ दिखना शुरू हुआ।  लेकिन जो दिखाई दिया , वह तो और भी ज्यादा खतरनाक था। पूरे करनाल बाइपास पर जगह जगह एक्सीडेंट हुई गाड़ियां पड़ी थीं। अधिकांश बुरी तरह से टूटी फूटी हुई।  एक जगह तो करीब १०० मीटर तक गाड़ियों के पुर्जे बिखरे पड़े थे।  ऐसा लग रहा था , मानो वहां कोई रॉयट्स ( दंगे ) हुए हों। सिर्फ खून कहीं नहीं दिखा , यह देखकर हमने सोचा कि चलो शुक्र है कि शायद किसी को चोट तो नहीं लगी होगी।

करनाल के बाद वातावरण साफ होने लगा और अम्बाला तक जाते जाते बिलकुल साफ हो गया।  चंडीगढ़ और मोहाली तो ऐसे साफ चमक रहे थे जैसे वहां कभी कोहरा होता ही न हो। वहां कोई सोच नहीं सकता था कि हम कैसे रास्ते से निकल कर आये हैं। वापसी में फिर करनाल तक रास्ता साफ मिला।  लेकिन उसके बाद शाम भी ढल गई , अँधेरा बढ़ने लगा था और कोहरा भी।  लेकिन विजिबलिटी इतनी थी कि ड्राइविंग में कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई। हमने भी श्रीमती जी को हाइवे पर ड्राइविंग का शौक पूरा करने का पूरा अवसर देते हुए दोनों ओर आधा रास्ता ड्राइव करने दिया। अंतत: रात के साढ़े आठ बजे हम घर पहुँच गए।

आज सुबह जब अख़बार खोला तो पता चला कि उन एक्सीडेंट्स में दस लोगों की मौत हो गई और ३०-४० लोग घायल हुए।  और इतनी ही गाड़ियां चकनाचूर हो गई थी। घंटों ट्रैफिक जैम भी रहा। बस शुक्र रहा कि हम बाल बाल बचते हुए सकुशल घर पहुँच गए। वापसी में रास्ते में अनेकों जगह खेतों में आग लगी देखी जिनसे निकलता हुआ धूंआं प्रदुषण फैला रहा था। यह साफ ज़ाहिर था कि पंजाब हरियाणा का यह धुआं हवा की दिशा के कारण दिल्ली की ओर ही आ रहा था , जबकि चंडीगढ़ और मोहाली का क्षेत्र साफ बचा हुआ था। क्या भगवान भी दिल्ली वालों को किसी बात की सजा दे रहा है ? ज़रा सोचिये ज़रूर।