Friday, April 27, 2012

फेसबुक ने बदल दी है ब्लॉगिंग की तस्वीर ---


लम्बे सप्ताहांत पर लम्बे सफ़र की लम्बी दास्ताँ जारी रहेगी . हालाँकि अभी दो दिलचस्प किस्त बाकि हैं . लेकिन अभी लेते हैं एक छोटा सा ब्रेक . ब्रेक के बाद आपको ले चलेंगे असली जंगल में .
इस बीच खुशदीप सहगल ने एक पोस्ट में लिखा -- हिंदी ब्लागिंग में इन दिनों मुझे खालीपन और भारीपन दोनों ही महसूस हो रहा है..खालीपन इसलिए कि मेरे पसंद के कुछ ब्लागरों ​ने लिखना बहुत कम कर दिया है...

खुशदीप भाई, दोस्तों ने लिखना कम नहीं किया , बल्कि पाला बदल लिया है . बल्कि यूँ कहा जाए -मित्र लोग अब पहले से ज्यादा वक्त लेखन में लगा रहे हैं . सुबह से लेकर शाम तक ---शाम से लेकर सुबह तक --लेखन ही कर रहे हैं . ज़रा देखिये तो :


थे
कभी ब्लॉगर जो , फेसबुकिया रहे हैं
छोड़ लेखन अब वो , मौनबतिया रहे हैं

चेहरे नए नए तब, प्रोत्साहित कर रहे थे
चेहरों पर नित अब , टैग टंगिया रहे हैं

रोज लिखते हैं इक , लेख दुनिया दरी पर
मोह टिप्पणी का भी , छोड़ एठियाँ रहे हैं

शाम ढल जाये या , रात बीते सुबह हो
भोर से संध्या तक , खबर छपिया रहे हैं

कौन कब जागा , कब नींद आई रतीयाँ
हाल हर पल का, सब ओर जतिया रहे हैं

चैट करते हैं जो , फेसबुक पर घंटों तक
ब्लॉग पढने का, तज मोह खिसिया रहे हैं

राह में देखे जो , 'तारीफ' राही अनेकों
कोइ रोते से , कुछ रंगरसिया रहे हैं


क्या आपको भी लगता है -- ब्लॉगर्स में ब्लॉगिंग का मोह भंग हो चुका है ?
क्या फेसबुक ने ब्लॉगिंग की तस्वीर बदल दी है ?




Monday, April 23, 2012

हर की पौड़ी पर गंगा मैया के भव्य दर्शन और आरती --( ३/५)


गौमुख से निकल गंगोत्री होती हुई भागीरथी नदी देवप्रयाग आकर बद्रीनाथ से आती हुई अलकनंदा से मिलकर गंगा बनती है । यहाँ से करीब ६० किलोमीटर हृषिकेश तक का पहाड़ी सफ़र गंगा की पवित्रता को बनाये रखता है। हालाँकि शिवपुरी नामक स्थान पर राफटिंग क्लब खुलने से मनुष्य की गंगा के साथ छेड़खानी शुरू हो चुकी है । गंगा सबसे ज्यादा पवित्र हरिद्वार में ही नज़र आती है ।

हमारा चिल्ला हरिद्वार आना पिछली बार ८ साल पहले हुआ था । सबसे पहला बदलाव तो यह लगा कि अब गाड़ी पार्क करने के लिए बड़ी आरामदायक पार्किंग बन गई है सड़क के साथ । गाड़ी पार्क कर सड़क के नीचे बने अंडर पास से होकर जैसे ही हम गंगा की तरफ आए, गंगा किनारे तक का १०० मीटर लम्बा रास्ता भिखारियों से अटा पाया । ऐसा लगा जैसे हरिद्वार के सारे भिखारियों के लिए यह स्थान आरक्षित कर दिया गया हो ।
उन्हें देख कर अनायास ही मुन्ना भाई फिल्म के उस जापानी टूरिस्ट की याद गई , जो कह रहा था --हंगरी इंडिया , पुअर इंडिया हरिद्वार में ऐसे स्वागत की अपेक्षा नहीं थी


लेकिन गंगा पर बने पुल पर आते ही , यह दृश्य देखकर मन आनंदित हो गया । हालाँकि तेज धारा में इस मोटर बोट को देख कर हैरानी हुई । यह समझ नहीं आया कि ये टूरिस्ट थे या लाइफ गार्ड

पुल पार कर पश्चिमी घाट पर पहुँच कर हम हरिद्वार की गलियों में घुस गए । खचाखच भरे बाज़ार में तरह तरह की दुकाने सजी थी , हालाँकि हमारा खरीदारी का कोई मन नहीं था । हमें तो जाना था मनसा देवी के मंदिर जो सामने पहाड़ की चोटी पर था । पिछली बार हमारा यहाँ आना १९८४ में हुआ था।

रास्ता पूछते हुए जब मेन रोड पर आए तो पता चला कि ट्रॉली की टिकेट्स बंद हो चुकी थी । इसलिए पैदल चलने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं था । वैसे भी हमें तो पैदल चलना ही अच्छा लगता है । करीब १०० मीटर की खड़ी सीढियां चढ़कर जब सड़क नज़र आई तो बड़ा इत्मिनान हुआ । सबसे पहले हमने चाय वाले को ढूँढा ।
लेकिन उसने ऐसी चाय पिलाई की पीने के बाद पीने और पिलाने वाले दोनों को शर्म रही थी

चाय ख़त्म कर हम तो लग गए अपने पसंददीदा काम पर ।



दूर गंगा पार नज़र आ रहा है -- चंडी देवी का मंदिर

आगे का रास्ता समतल सड़क का था । इसलिए मस्ती में चलते और फोटो खींचते हुए चलते रहे ।

इस सूखे से पेड़ पर ये कोई मोटे मोटे फल नहीं लगे हुए , बल्कि बन्दर हैं जो पेट भरकर खेलने में व्यस्त हैं ।



यदि ट्रॉली से आते तो क्या यह फोटो खींच पाते !

करीब आधा किलोमीटर पैदल चल कर हम पहुँच गए मंदिर में । किसी भी मंदिर में हमारा आना करीब १५ साल बाद हुआ था । वैसे भी हमें तो मंदिर से ज्यादा आस पास की खूबूरती ज्यादा आकर्षित करती है । लेकिन यहाँ आकर आअश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई यह देख कर कि सब इंतज़ाम बहुत बढ़िया थे । मंदिर भी साफ था । बिना किसी हील हुज्ज़त के हमने मंदिर का चक्कर लगाया । कदम कदम पर पंडित बैठे थे लेकिन कोई लूट मार नहीं थी। सब श्रद्धानुसार दान पात्र में १०-२० रूपये डाल रहे थे ।

मुख्य गर्भकक्ष के आगे बहुत भीड़ थी । लोग प्रसाद चढ़ा रहे थे । लेकिन हम कुछ लेकर नहीं गए थे । हमने श्रीमती जी से कहा --चिंता नहीं , १०१ रूपये दान कर दो । पंडित जी ने भी ख़ुशी ख़ुशी फटाफट रसीद काट दी । फिर एक छोटे से आधे कटे नारियल में कुछ गुलाब के फूल प्रसाद के रूप में दिया जिसे पाकर श्रीमती जी तो कृतार्थ हो गई ।
हम खड़े खड़े देख रहे थे उस नौकर को जो सर पर नारियल से भरा ५० किलो का बोरा रखकर बाहर निकला
रास्ते में सैंकड़ों सेल्समेन को नारियल वाला प्रसाद बेचते देखकर जो लग रहा था कि इतने नारियल कहाँ से आते होंगे , वह राज़ अब खुल रहा था

लेकिन वर्षों बाद खुशबू वाले गुलाब देखने को यहीं मिले


मंदिर से वापसी के लिए हमने चुना दूसरा रास्ता जिससे उत्तर दिशा का नज़ारा दिख रहा था ।
चित्र में गंगा घाट और शाम की आरती के लिए एकत्त्रित हुए हजारों श्रद्धालु । दूर नज़र आ रहा है बैरेज जिससे गंगा की दिशा बदलकर मोड़ दिया गया है घाट की ओर । गंगा पार जो घना जंगल नज़र आ रहा है उसके बायीं ओर है चिल्ला रेस्ट हाउस ।



दक्षिण दिशा में सारा हरिद्वार शहर सूखे पेड़ों के बीच सुन्दर लाल रंग के फूल मानो सन्देश दे रहे हैं कि जिंदगी में सुख दुःख , धूप छाँव सब एक साथ मिलते हैं



सैंकड़ों सीढियां उतरकर हम पहुँच गए घाट पर जहाँ शाम की आरती की तैयारियां चल रही थी । इस बीच कुछ लोग गंगा में डुबकी लगाने की कोशिश करते नज़र आए । श्रीमती जी भी मचलने लगी पानी में कूदने के लिए । लेकिन बहुत तेज हवा चल रही थी और पानी का बहाव भी बहुत तेज था । बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाया कि बस छूकर निकल लें ।



आरती दर्शन के लिए एकत्त्रित विशाल जन समूह भीड़ में अक्सर हम तो किनारे हो जाते हैं लेकिन श्रीमती जी ने वीरांगना का रोल प्ले करते हुए दोनों के लिए जगह बना ही ली



गंगा मैया की आरती रोज शाम को सूरज छिपने के बाद की जाती है यह वास्तव में एक बहुत खूबसूरत नज़ारा होता है सारा जहाँ जैसे गंगा मैया की भक्ति में डूब सा जाता है



आरती के बाद हम चल पड़े वापस पार्किंग की ओर । लेकिन इस बीच श्रीमती जी को याद आया कि उन्होंने गंगा मैया की पूजा तो की ही नहीं । हमने भी तय कर रखा था कि आज उनकी कोई भी तमन्ना अधूरी नहीं रहने देंगे । सामने ही एक फूल वाली दिखी तो फूलों का डोंगा खरीद लिया । आनन फानन में जाने कहाँ से एक पंडित बिन बुलाये मेहमान की तरह आ टपका और शुरू हो गया मन्त्र बोलने । अब तक हम भी समझ गए थे कि ऊँट पहाड़ के नीचे आ चुका है । लेकिन कोई ग़म नहीं था । हमने भी खुले दिल से पंडित जी को १०१ रूपये देकर अपना पति धर्म निभाया ।

और इस तरह पूरा हुआ हमारा हर की पौड़ी पर गंगा दर्शन ।
अब आप भी घर बैठे आनंद लीजिये गंगा मैया की आरती का ।

Thursday, April 19, 2012

रोमांस और रोमांच की अद्भुत कॉकटेल --जंगल में मंगल (भाग-२)

ल्ली जैसे शहर के व्यस्त जीवन की आपा धापी में अक्सर लोग तनाव ग्रस्त रहते हैं . ऐसे में शॉर्ट ब्रेक लेकर घर से बाहर निकल किसी शांत जगह जाकर कुछ समय बिताना एक स्ट्रेस बस्टर का काम करता है . यूँ तो दिल्ली के पास बहुत से ऐसे स्थान हैं जहाँ वीकेंड पर जाया जा सकता है . लेकिन एक ऐसी जगह है जो सिर्फ धार्मिक पवित्र स्थल माना जाता है बल्कि वहां जाकर एक परम शांति का अहसास होता है. साथ ही रोमांस और रोमांच की अद्भुत कॉकटेल आपको एक ऐसी दुनिया में ले जाएगी जिस की आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी .
दिल्ली से मात्र २०० किलोमीटर और ४ घंटे के सफ़र की दूरी पर है हरिद्वार . यहीं पर है चिल्ला वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी जो राजा जी नेशनल पार्क का एक हिस्सा है . दिल्ली से हरिद्वार पहुंचते ही बायीं ओर हैं गंगा घाट यानि हर की पौड़ी . ठीक इसके विपरीत दायीं ओर , गंगा पार फैला है चिल्ला फोरेस्ट . हर की पौड़ी से करीब - किलोमीटर दूर जंगल के बीच बना है --चिल्ला रेस्टहाउस -- जिसे गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा १९८१ में बनाया गया था . नदी पर पुल पार करते ही एक सडक बायीं जाती है जो जंगल से होती हुई आपको ले जाएगी इस आरामदायक रेस्ट हाउस में .
यहाँ एक हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्लांट है जिसमे बिजली पैदा की जाती है . इसके लिए हृषिकेश से एक केनाल बनाई है जिसमे गंगा का पानी बहता है .
इसी केनाल के किनारे पावर प्लांट के सामने बना है चिल्ला रेस्ट हाउस .

यहाँ रहने के लिए ऐ सी कमरा ( १९०० रूपये प्रतिदिन ) , नौंन ऐ सी कमरा ( १५०० ), हट्स (१२००) और डोरमेट्री २०० रूपये प्रतिदिन के हिसाब से मिलती हैं .

रेस्ट हॉउस के गेट के सामने एक छोटा सा लेकिन बहुत खूबसूरत बगीचा है जहाँ टेबल चेयर पर बैठकर आप शाम की चाय या खाने का लुत्फ़ उठा सकते हैं .


मून ने हनी का फोटू उतारा तो बन गया हनीमून .

यहाँ ६ हट्स बनी हैं जिनमे सारी सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं .
हट्स के सामने एक बड़ा पार्क है जहाँ खुले में या झोंपड़ी के नीचे बैठकर चाय पकोड़े खाने में बड़ा मज़ा आएगा .
खाने के लिए एक रेस्ट्रां है जहाँ विनोद रावत जी आपको घर जैसा स्वादिष्ट खाना अपने हाथों से बना कर खिलाएंगे .


रेस्ट्रां की बड़ी बड़ी खिडकियों से बाहर का नज़ारा बेहद खूबसूरत नज़र आता है . हरा भरा पार्क , बाहर सड़क औरउसके बाद नदी . नदी के पार का घना जंगल आप यहाँ बैठे बैठे ही देख सकते हैं .



खाने के बाद झूले पर बैठकर आप कुछ पल शांति के साथ बै पर आनंद की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं .


रेस्ट हाउस के कॉम्प्लेक्स के बाहर सड़क है जो केनाल पार हृषिकेश की ओर जाती है .


रेस्ट हाउस के सामने केनाल के साथ साथ रात में डिनर के बाद टहलते हुए एक दिव्य आनंद की अनुभूति होती है . बिल्कुल शांत और सुनसान लेकिन पूरी तरह से रौशन जंगल के बीच चहलकदमी करते हुए आप भूल जायेंगे दीन दुनिया को .



रेस्ट हाउस और केनाल के बीच एक सड़क है जो लगभग आधा किलोमीटर दूर तक केनाल के साथ जाती है . इसके बायीं ओर एक बरसाती नदी है जिसका पाट काफी चौड़ा है



इसके आखिरी छोर पर दोनों नदियाँ मिल जाती हैं . यह स्थान बेहद खूबसूरत अहसास देता है . दायीं तरफ कल कल बहती नदी , बायीं तरफ सूखी नदी , सामने समतल मैदान में मिलती दोनों नदियाँ और चारों ओर घना जंगल . कुल मिलकर एक स्वर्गिक आनंदमयी अहसास .


यहाँ आप चाहें तो घंटों अकेले बैठकर रोमांटिक पलों को जी सकते हैं . -- एक मैं हूँ , एक तुम हों और तीसरा कोई हो -- इस इच्छा की यहाँ पूर्ण रूप से पूर्ती हो सकती है . यहाँ से वापस लौटते हुए आप एक बात के लिए निश्चिन्त रह सकते हैं -- खुले आसमान के नीचे , हरी भरी वादियों में आप अपने प्रियतम के साथ हाथ में हाथ डालकर चलें या कमर में , आपको देखने या डिस्टर्ब कर
ने वाला कोई नहीं होगा .
भला पृथ्वी पर कोई और ऐसी जगह है शहर के इतने करीब

इंसान के दिल में चार कक्ष ( चैंबर ) होते हैं . एक में बुजुर्गी अनुभव रहता है , दूसरे में ज़वान धड़कनें बस्ती हैं और तीसरे में हमेशा एक बच्चा रहता है ।

बच्चे बन कर हमने भी नदी में कंकड़ फेंके .


एक अर्से के बाद ऐसा करने का अवसर मिला .

चौथा कक्ष मेहमानखाना होता है . हमारे इस कक्ष में रहता है एक कवि .
कवि जो अपनी कल्पना को हकीकत का ज़ामा पहना कर रचना का निर्माण करता है जिसे दुनिया वाले कविता कहते हैं और हम रेखा .


रेखा --हमारी मर्यादा की रेखा .
जैसे कोई पहाड़ी लड़की किसे के इंतज़ार में बैठी हो .
अंत में नदी में उतरकर पानी को पास से देखने का प्रलोभन हम नहीं छोड़ पाए .



नदिया के पार --दूसरे किनारे पर भी ऐसी ही सड़क है . लेकिन सड़क के पार है घना जंगल . यह प्रतिबंधित क्षेत्र है लेकिन पैदल घूम सकते हैं . हालाँकि एक तरफ नदी , दूसरी तरफ घने जंगल के बीच सड़क पर घूमने के लिए बहुत बड़ा ज़िगर चाहिए . हम तो १०० मीटर जाकर ही फोटो खींच कर वापस हो लिए-- यह सोचते हुए की -- हम तुम इक जंगल से गुजरें , और शेर आ जाए -- तो शेर से क्या कहेंगे ? इस धर्म संकट से बचने के लिए वापस मुड़ना ही बेहतर समझा .

कुल मिलाकर यहाँ बिताये तीन दिन और दो रातें अपने आप में एक ऐसा अनुभव है जिसे महसूस करने के लिए आप को स्वयं जाना पड़ेगा .
लेकिन यह सुखद अहसास तभी संभव है जब --

मन में उमंग हो
तन में तरंग हो .
दिल में खुमार हो
आपस में प्यार हो .

वर्ना बीबी से यही सुनना पड़ सकता है -- अज़ी बोर कर दिया . कहाँ जंगल में ला कर पटक दिया .
---क्रमश: