Tuesday, October 30, 2012

जब नज़रें धोखा खा जाएँ और दिमाग चक्कर --- तब जादू होता है .



जादू एक ऐसा खेल है जो मनुष्य को सदियों से अचंभित और आनंदित करता आया है। हालाँकि यह सब जानते हैं और जादूगर स्वयं मानते और बताते हैं कि जादू कोई चमत्कार नहीं होता बल्कि नज़रों का एक धोखा है। यानि यह एक रहस्यमयी खेल है और जब तक रहस्य पता नहीं चलता तब तक जादू हैरानी में डाले रहता है।

गली में कबूतर उड़ाने वाले से लेकर पी सी सरकार जैसे जाने माने जादूगर और ताजमहल को गायब करके दिखाने वाले विदेशी जादूगरों का रहस्य आज तक कोई पता नहीं कर पाया। यही इस खेल का मूल सिद्धांत है।
जब तक रहस्य बना रहेगा , जादू एक चमत्कार लगेगा।

और यह रहस्य कोई जादूगर नहीं बताएगा। आखिर रोजी रोटी का सवाल है। फिर भी जादू के बारे बहुत सी बातें समझ में आती हैं।  जैसे :

* जादू के लिए जादूगर विशेष साधनों और उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं।

* जादू दिखाने में हाथों का तेजी से इस्तेमाल किया जाता है जिसका अभ्यास बहुत काम आता है।

* जादू दिखाते समय बातों का बहुत बड़ा रोल होता है। जादूगर बातें बनाकर आपका ध्यान दूसरी ओर आकर्षित कर लेता है और हाथों से ध्यान हटा देता है।

बाज़ार में ऐसे बहुत से खेल और जादू उपलब्ध हैं जिन्हें सीखकर आप भी जादूगर बन लोगों को हैरत में डाल सकते हैं। फिर भी कभी कभी कोई एक ऐसा खेल देखने को मिल जाता है जिसका रहस्य समझ में नहीं आता।
ऐसा ही एक जादू हमने देखा और समझने की कोशिश की। उसे फिर से देखकर वीडियो भी बनाया ताकि बार बार देखकर उसका रहस्य समझा जा सके। लेकिन कुछ समझ नहीं आया।

आइये आपको भी दिखाते हैं इसका वीडियो :






अब बताईये इसका रहस्य। कैसे हवा में उठा यह स्टूल ?  

Saturday, October 27, 2012

मौसम और मच्छरों की मार -- डेंगू बुखार ...


देश में , विशेषकर दिल्ली, एन सी आर और मुंबई में डेंगू बुखार के बढ़ते प्रकोप से और यश चौपड़ा की अकस्मात् मृत्यु से डेंगू बुखार से सावधान रहना समय की मांग है. इस वर्ष बरसात  का मौसम देर तक चलने की वज़ह से डेंगू भी देर से फैला है. जनता को जागरूक करने के लिए सरकार ने काफी प्रयास किये हैं जिनमे रेडियो , टी वी आदि पर विज्ञापन के अलावा अस्पतालों में रोगियों को पर्चे बांटे जाते हैं जिनमे डेंगू से बचाव के तरीके बताये जाते हैं . आइये जानते हैं , डेंगू से कैसे बचाव किया जा सकता है : 

डेंगू बुखार एक वायरल बुखार है जो एडीज इजिप्टाई नाम के मच्छर के काटने से फैलता है. डेंगू का वायरस मच्छर की लार से मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है और रक्त में फैलकर अपना प्रभाव दिखाता है. अक्सर यह मच्छर  साफ़ लेकिन स्टेगनेंट पानी में पाया जाता है . यह दिन के समय काटता है .  

डेंगू बुखार के लक्षण : 

डेंगू बुखार तीन तरह से प्रस्तुत होता है. 

१)  डेंगू बुखार : तेज बुखार , सर दर्द , आँखों के पीछे दर्द , जोड़ों और मांस पेशियों में दर्द और शरीर पर लाल दाने आदि आम लक्षण होते हैं . अक्सर इसे अन्य वायरल फीवर से अलग पहचानना मुश्किल होता है. लेकिन खांसी और जुकाम , गला ख़राब आदि नहीं होता.  

२) डेंगू हेमरेजिक फीवर : इसमें बुखार के साथ शरीर से रक्त श्राव होने लगता है जैसे उलटी में खून , पेशाब में खून या नाक से रक्त श्राव आदि. यह तभी होता है जब रक्त में प्लेटलेट्स की कमी हो जाती है . यह डेंगू का एक चिंताज़नक लक्षण है और रोगी को तुरंत अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है.  

३) डेंगू शॉक सिंड्रोम :   इस अवस्था में बुखार के बाद रोगी का ब्लड प्रेशर अचानक बहुत कम हो जाता है जिससे सभी अंगों पर प्रभाव पड़ सकता है . यह एक इमरजेंसी होती है . यदि तुरंत सही इलाज उपलब्ध न हो तो रोगी की मृत्यु भी हो सकती है. यह डेंगू का सबसे ख़राब रूप है.     

डेंगू बुखार में निम्न परिस्थितियों में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है जब डॉक्टर से परामर्श करना अनिवार्य होता है : 

* बच्चे , बूढ़े और गर्भवती महिलाएं , डायबिटिज , क्रॉनिक लीवर या किडनी रोग . 
* अचानक पेट में तेज दर्द , लगातार उल्टियाँ , रक्त श्राव , लो ब्लड प्रेशर , बेहोशी या गफ़लत की हालत. 
* जाँच करने पर ब्लड प्रेशर में बदलाव , नाड़ी की गति का अत्यधिक तेज होना , प्लेटलेट्स की संख्या २०००० से कम होना और रक्त श्राव . 

डेंगू होने पर क्या करें :   

* बुखार के लिए सिर्फ पेरासिटामोल की गोली ही लें . एस्प्रिन और अन्य दर्द निवारक दवाओं का सेवन न करें . 
* उचित मात्रा में पानी और अन्य तरल पदार्थ लेते रहना चाहिए ताकि पानी की कमी न हो. 
* उपरोक्त खतरे के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लें .   
* नीम हकीम और चमत्कारिक डॉक्टरों के चक्कर में न पड़ें . उचित अस्पताल में ही इलाज कराएँ .
* डेंगू का न ही कोई उपचार है , न कोई वैक्सीन। लेकिन सपोर्टिव इलाज से ही रोगी पूर्णतया ठीक हो जाते हैं।

निदान :  

* आम तौर पर डेंगू रोगी के लक्षण देखकर ही पता चल जाता है विशेषकर जब बुखार के साथ रैश भी नज़र आए। 
* प्लेटलेट काउंट्स --    डेंगू बुखार में  प्लेटलेट्स  संख्या सामान्य से कम हो जाती है। लगातार गिरती संख्या डेंगू के पक्ष में जाती है . यदि 20, 000  से कम हो तो अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए। 10000 से नीचे प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की ज़रुरत पड़ती है।   
* एलाइजा टेस्ट और डेंगू सिरोलोजी : आई जी एम् एंटीबोडीज का रक्त में पाया जाना डेंगू का एक्टिव इन्फेक्शन दर्शाता है। जबकि आई जी जी एंटीबोडीज का होना पुराना संक्रमण दर्शाता है।

डेंगू से बचाव के तरीके : 

* सबसे ज़रूरी है घर के आस पास साफ सफाई रखना और कहीं भी पानी जमा न होने देना। कूलर , बर्तन , गमले आदि में पानी जमा न होने दें।  गर्मियों में कूलर में सप्ताह में एक बार एक बड़ा चम्मच टेमीफौस ग्रेनुल्स डालें या फिर मिटटी का तेल भी डाल सकते हैं।
* दिन में पूरी बाजु की कमीज़ पहने। जहाँ तक हो सके शरीर को ढक कर रखें।
* मच्छर मार दवा का स्प्रे भी लाभदायक रहता है।

नोट: डेंगू होने पर घबराएँ नहीं। जब तक ऊपर बताये गए गंभीर लक्षण नज़र नहीं आते , तब तक घर में रह कर भी इलाज़ कराया जा सकता है। डेंगू में प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की ज़रुरत तभी पड़ती है जब प्लेटलेट काउंट्स 10000 से कम हो या  रक्त श्राव होने  लगे। बचाव के लिए प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की ज़रुरत नहीं  होती।

डेंगू और चिकनगुनियामें थोडा सा ही अंतर होता है .चिकनगुनिया में जोड़ों में दर्द ज्यादा होता है और लम्बे समय तक रह सकता है। दोनों का इलाज एक जैसा ही है। 



Wednesday, October 24, 2012

जल जायेगा रावण बेचारा -- क्या मन के रावण को मारा !


और एक बार फिर रावण जल जायेगा। बड़ा बेहया है ये वाला रावण। हर वर्ष जलता है , फिर अगले वर्ष पहले से भी बड़ा होकर फिर मूंह उठाकर खड़ा हो जाता है। जलाने वाले भी ऐसे हैं कि थकते ही नहीं। पूरे नौ दिनों तक विविध रूप के कर्मकांड करते हुए दसवें दिन धूम धाम से ज़नाज़ा निकालते हैं और जला कर राख कर खाक में मिला देते हैं . एक बार फिर अन्याय, अधर्म और पाप की हार होती है और न्याय, धर्म और पुण्य की जीत होती है जिसका जश्न भी तुरंत मना लिया जाता है।

यह दुनिया भी अजीब है। जब एक देश में दिन होता है , उसी समय किसी दूसरे देश में रात होती है। इसी तरह एक धर्म के पर्व दूसरे धर्मों के लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखते। यहाँ तक कि एक ही धर्म के लोगों में भी विविधता देखने को मिलती है। एक ही पर्व को एक क्षेत्र के लोग एक तरीके से मनाते हैं,  दूसरे क्षेत्र के लोग दूसरे प्रकार से।

अब दशहरा पर्व को ही लीजिये। समस्त उत्तर भारत में दशहरा से पहले नवरात्रे मनाये जाते हैं जिनमे लोग उपवास रखते हैं , सामान्य अन्न खाना छोड़ देते हैं , एक विशेष प्रकार के आहार पर गुजारा करते हैं। इस दिनों में सब लोग मांसाहार छोड़ शुद्ध सात्विक भोजन करने लगते हैं। यहाँ तक कि मदिरा पान पर भी स्वयंभू प्रतिबन्ध लगा देते हैं। दसवें दिन रावण की आहुति देते ही सारे प्रतिबन्ध समाप्त हो जाते हैं।

उत्तर भारत में इन दिनों में सारी पार्टियाँ, भोज और जश्न आदि स्वत: ही प्रतिबंधित हो जाते हैं। लेकिन कुछ लोग तो दिल ही दिल में एक एक दिन गिन गिन कर काटते हैं। फिर जैसे ही रावण वध होता है , सबसे पहले उसका ही जश्न मनाया जाता है। अक्सर अधिकतम पार्टियाँ नवरात्रों से एक दिन पहले और तुरंत बाद आयोजित की जाती हैं। आखिर , एक नहीं दो नहीं , पूरे नौ दिनों तक संयम जो रखना पड़ता है।

मत कहो,कि चीज़ अच्छी नहीं शराब 
बस नवरात्रों में ही होती है, यह खराब .     

दूसरी ओर बंगाली समाज इसी समय दुर्गा पूजा का पर्व मनाता है। खूबसूरत रंगों और साज सजावट से बनी दुर्गा माँ की मूर्ति की प्रतिदिन पूजा की जाती है। और अंत में उसे यमुना नदी में बहा दिया जाता है। इस बीच स्वादिष्ट पकवानों से जिव्हा की भी पूर्ण संतुष्टि का विशेष ख्याल रखा जाता है। खाने में नाना प्रकार की मच्छलियाँ और अन्य मांसाहार शौक से उदरित किये जाते हैं।

यह देखकर कई सवाल मन में उठते हैं।

* ऐसा क्यों कि इस पर्व में कुछ लोगों के लिए मांसाहार वर्जित हो जाता है,जबकि दूसरे लोग शौक से खाते हैं ?
* क्या शराब और मांसाहार इतने ख़राब हैं कि नवरात्रों में इनका सेवन वर्जित है ?
* यदि हाँ, तो फिर बाकि पूरे साल इनका सेवन क्यों किया जाता है ?
* क्या नौ दिन तक सात्विक रहकर पूरे साल के लिए आत्मिक शुद्धि हो जाती है ?

हमारे लिए तो हर दिन नया दिन और हर रात नई रात होती है। यह अलग बात है कि इन पर्वों से जीवन में विविधता आती है। औरों की खातिर हम भी इन व्यसनों से दूर रहते हैं। हालाँकि वैसे भी हम तो शुद्ध शाकाहारी हैं और मदिरापान कभी कभार ही करते हैं।

काश कि मानसिक पवित्रता का जो ज़ज्बा हम अपने पर्वों में दिखाते हैं , वही सम्पूर्ण जीवन में भी उतार लें। 

नोट : रावण वस्तुत: एक मनोदशा होती है। हमारे मन के अहंकार और हठधर्म का नाम ही रावण है। इन मनोभावों को जीतना ही वास्तविक विजय है। जो अपने मन के रावण पर विजय प्राप्त कर लेता है , वही राम कहलाने योग्य है . दशहरा की शुभकामनायें।   



Sunday, October 21, 2012

आम आदमी के लिए फलों का राजा आम नहीं , केला होता है --


कहते हैं आम फलों का राजा है . ज़ाहिर है , राजा है तो आम आम आदमी की पहुँच से बाहर ही होगा . इसीलिए बचपन में हमें भी जो फल सबसे ज्यादा प्यारा लगता था वो आम नहीं केला था . आखिर , तब हम भी तो आम आदमी ही थे . भले ही अब आम आदमी से ऊपर उठ गए हैं ( बाहर की दुनिया देखकर ऐसा लगता है ) , लेकिन रहते तो बनाना रिपब्लिक में ही हैं . इसलिए फलों में सबसे प्रिय अभी भी केला ही है . इसका भी वैज्ञानिक कारण है। बचपन में जो बातें सिखाई जाती हैं या परिस्थितिवश सीखने को मिलती हैं , वे जिंदगी भर न सिर्फ याद रहती हैं बल्कि आपकी जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं .

समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है, फलों का स्वरुप भी। जब हम स्कूल में पढ़ते थे , तब केले 50 पैसे दर्जन मिलते थे . केले बेचने वाला भी आवाज़ लगाता -- केला मक्खन मलाई हो रिया है। उन दिनों जो केले सबसे ज्यादा पसंद किये जाते थे वे होते थे -- चित्तीदार केले। ऐसे केले लम्बे होते जिनका छिल्का बहुत पतला होता और छिल्के पर छोटे छोटे चित्ते ( स्पॉट्स ) उभर आते जो न सिर्फ देखने में खूबसूरत लगते बल्कि खाने में भी वास्तव में मक्खन मलाई जैसा स्वाद आता था। ज्यादा पकने पर ये केले 25 पैसे दर्जन मिलते थे .

आज 40 साल बाद केले 50 रूपये दर्जन मिलते हैं . आम आदमी भले ही घर के लिए दर्जन न खरीद पाए , लेकिन रिश्तेदारों को देने के लिए आज भी केले ही सबसे सस्ते पड़ते हैं . लेकिन अफ़सोस, अब चित्तीदार केले देखने को नहीं मिलते . ज़ाहिर है , समय के साथ केलों की किस्म में बदलाव हुआ है . वैज्ञानिक शोध और आधुनिक प्रणाली ने केलों की गुणवत्ता को ही बदल दिया है .

आजकल ट्रकों पर लदे केले हरे, रहड़ी में रखे पीले और घर में आकर काले नज़र आते हैं . यानि अब पकने के बाद केलों पर चित्तियाँ नहीं बनती बल्कि केले सारे ही सड़कर काले हो जाते हैं . कभी कभी तो देखने में आता है कि बाहर से साफ सुथरे दिखने वाले केले अन्दर से सड़े हुए निकलते हैं .

इसका कारण प्रतीत होता है भ्रष्टाचार,  जो खाद्य पदार्थों में मिलावट के रूप में और पैदावार बढ़ाने के लालच में फलों और सब्जियों में हानिकारक रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल के रूप में बहुधा नज़र आता है। पिछले वर्ष केलों का स्वाद और स्वरुप देखकर बहुत दुःख हुआ था क्योंकि मार्केट में ज्यादातर केले मिलावटी ही आ रहे थे।

लेकिन इस वर्ष यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि आजकल मिलने वाले केले प्राकृतिक रूप से , सुन्दर स्वस्थ , पौष्टिक  और स्वादिष्ट हैं . भले ही चित्तीदार न हों , लेकिन केलों का स्वाद लौट आया है . मार्केट में आजकल बड़े बड़े केले जो हमें हमेशा लुभावने लगे हैं , भरे पड़े हैं . इसलिए क्यों न इस फेस्टिवल सीजन में मिठाइयाँ छोड़ फलों पर ध्यान दिया जाये , विशेषकर केले जो आम आदमी के आम होते हैं .

आइये देखते हैं , केले के स्वास्थ्य सम्बन्धी गुण :

* केले में कार्बोहाईड्रेट, विटामिन ऐ, बी 6, विटामिन सी , फोलेट और लोह तत्व पाए जाते हैं . कार्बो से ऊर्जा मिलती है और बाकि तत्वों से रक्त की कमी नहीं होती .

* केले में खनिज पदार्थ होते हैं -- पोटासियम, मैग्नीज , मैग्निसियम , कैल्सियम और आयरन जो शारीरिक प्रतिक्रियाओं के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं .

* फाईबर -- एक केले में करीब 3 ग्राम फाइबर होता है जो कब्ज़ होने से रोकता है .

* केले में फैट , ट्रांस फैट्स और कोलेस्ट्रोल न के बराबर होता है . इसलिए हृदय रोगियों और हाई कोलेस्ट्रोल के रोगियों के लिए बड़ा लाभदायक है .

* सोडियम भी कम होने से ब्लड प्रेशर के रोगी भी खा सकते हैं .

* एक केले में करीब 110 केल्रिज होती हैं .

उपयोग :

* केले शिशुओं में सॉलिड आहार आरम्भ करने का सर्वोत्तम जरिया है . इसमें शिशु के लिए सभी उपयुक्त पोषक तत्व मौजूद होते हैं .

* केले वज़न घटाने और बढ़ाने --  दोनों में काम आ सकते हैं।

* इसी तरह केले दस्त और कब्ज़ -- दोनों में फायदा पहुंचाते हैं .

* केले एक लो कोलेस्ट्रोल , लो फैट , लो सोडियम लेकिन हाई फाईबर डाईट है।

विशेष सावधानी : पके हुए केले में सुगर कंटेंट ज्यादा होने से डायबिटिक्स को ज्यादा नहीं खाने चाहिए . एक स्वस्थ व्यक्ति एक दिन में 10 केले तक भी खा सकता है . हालाँकि ऐसा करने की आवश्यकता नहीं होती . बेहतर है कि हम अपना भोजन संतुलित रखें जिसमे फलों की उचित मात्रा होना अनिवार्य है .

नोट : जिंदगी में संतुलन आचार व्यवहार, सोच विचार और आहार , सभी में आवश्यक है . 
 


Thursday, October 18, 2012

ओह माई गौड -- ये है गीता का ज्ञान !


नवरात्रे शुरू हो चुके हैं . वातावरण में धार्मिक पर्वों और शादियों की मिली जुली सुगंध एक साथ फ़ैल रही है। अब दीवाली तक मौसम यूँ ही खुशगवार रहेगा। श्राद्ध ख़त्म होते ही नवरात्रे शुरू हो गए , फिर दशहरा , उसके बाद दिवाली तक 20 दिनों की गहमागहमी। वर्ष के ये दिन खुशियों से तो भरे होते हैं लेकिन भाग दौड़ भी खूब रहती है . सडकों पर अभी से ट्रैफिक बढ़ने लगा है . लेकिन इस मौसम में हमारी धार्मिक आस्थाएं और मान्यताएं भी पूरे जोरों पर दिखाई देती हैं . पित्रों को भोग लगाने से लेकर साल दर साल दसमुखी रावण को  जलाने का उपक्रम और फिर दीवाली के बाद गंगा स्नान कर सारे पाप धोने के साथ सर्दियाँ शुरू हो जाती हैं।

शिखा वार्ष्णे जी की पोस्ट पढ़कर अहसास हुआ कि इस समय तीन बहुत अच्छी फ़िल्में चल रही हैं - बर्फी तो हम देख चुके थे लेकिन ओह माई गौड और इंग्लिश विन्ग्लिश देखनी बाकि थी . श्रीमती जी की भी सिफारिश और फरमाईश थी ओ एम् जी देखने की . हालाँकि आजकल हॉल में फ़िल्में देखने में हमें कोई विशेष आनंद नहीं आता लेकिन कभी कभार मेडम को घुमाने के लिहाज़ से मॉल में फिल्म देखने चले जाते हैं . इसी बहाने गुजरे ज़माने में मॉल कल्चर न होने का मलाल भी कम हो जाता है।

हालाँकि परेश रावल और अक्षय कुमार की जोड़ी का हास्य हमेशा ग़ज़ब का होता है . लेकिन इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता है, इसका विषय। समाज में फैले अंध विश्वास , धार्मिक मान्यताओं और गलत धारणाओं  पर कटाक्ष करते हुए एक साफ सुथरी हास्य फिल्म बनाने के लिए निर्माता और निर्देशक की दिल खोलकर तारीफ़ करनी पड़ेगी .

फिल्म के नायक वास्तव में परेश रावल ही हैं . भगवान की मूर्तियों के व्यापारी परेश रावल स्वयं धार्मिक ढकोसलों में विश्वास नहीं रखते , लेकिन दूसरों के अंध विश्वास का पूरा फायदा उठाते हुए साधारण मूर्तियों को
महंगे दाम पर बेचकर बढ़िया कमाई करते हैं . किन्तु एक भूकंप में उनकी दुकान ढह जाती है और सब कुछ मटियामेट हो जाता है . क़र्ज़ में डूबे परेश रावल जब बीमा कंपनी जाते हैं तो उन्हें यह कह कर भगा दिया जाता है कि यह एक्ट ऑफ़ गौड है जो बीमा की शर्तों अनुसार कवर नहीं होता . पूरी तरह से लुट चुके परेश किस तरह  नयायालय में भगवान पर मुकदमा कर न सिर्फ केस जीतते हैं बल्कि दूसरों को भी जिताते हैं . यह पूरा प्रकरण बहुत हास्यपूर्ण और एक नए अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है .

फिल्म की सबसे अच्छी बात यह लगी कि इसमें बिल्कुल एक ऐसी सोच को प्रदर्शित किया गया है जिसे कहने सुनने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता . आस्तिक और नास्तिक की परिभाषा, लोगों का भगवान के नाम पर अँधा विश्वास , ढकोसले, धार्मिक अफवाहें, जनता का सामूहिक पागलपन और भगवान के नाम का सहारा लेकर भोली भाली जनता को लूटने वाले धर्म के ठेकेदार और तथाकथित साधू महात्माओं का पर्दाफाश बहुत प्रभावी रूप से किया है .

फिल्म में मुख्य रूप से हिन्दुओं के धार्मिक रीति रिवाज़ों पर करारा प्रहार किया गया है , हालाँकि इस्लाम और ईसाई विचारधारा पर भी ध्यान दिलाया गया है . फिल्म में सिक्खों पर कोई टिप्पणी नहीं है। हिन्दुओं में मूर्ति  पूजा , प्रसाद चढाने , वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा , साईं बाबा को सोने के आभूषण पहनाने , शिव लिंग पर दूध चढाने जाने जैसे अनेक मुद्दों पर कटाक्ष करते हुए यह समझाने की कोशिश की गई है कि भगवान मंदिर, मस्जिद या चर्च में नहीं पाए जाते बल्कि कण कम में और जन जन में समाये हैं . जो धन राशी और सामग्री हम इस तरह व्यर्थ करते हैं , वह किसी गरीब के काम आये तो ज्यादा सार्थक होगा।

फिल्म में संसद पर भी एक कटाक्ष है . धर्म गुरु और माफिया पर गहरी चोट की गई है . इस फिल्म को देखकर ओशो रजनीश की याद आती है जिनके क्रन्तिकारी विचार कहीं न कहीं हमें भी बहुत पसंद आए थे। विशेषकर धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने वाले, दिखावा करने वाले और अंध विश्वासों से ग्रस्त लोगों को सही दिशा दिखाने का प्रयास अत्यंत सराहनीय है।

फिल्म की सबसे अच्छी बात यह लगी कि फिल्म के अंत में गीता के ज्ञान पर विशेष जोर दिया गया है . गीता के ज्ञान अनुसार जीवन जीने का मार्ग बहुत हल्के फुल्के लेकिन प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है . फिल्म को देखकर लगता है जैसे इसके निर्माता और निर्देशक आर्य समाजी होंगे .

फिल्म देखकर हम तो श्रीमती जी से यह कहने पर बाध्य हो गए कि ऐसा लगा जैसे यह फिल्म स्वयं हमने बनाई हो . विचारों की समानता इससे ज्यादा नहीं हो सकती . 





Saturday, October 13, 2012

ब्रह्मचर्य का पालन ही मनुष्य को सात्विक बनाता है ...


पिछली पोस्ट पर विषय अति संवेदनशील होने के कारण डिस्क्लेमर तो लगा दिया था लेकिन विश्वास भी था कि हमारे परिपक्व ब्लॉगर मित्र हल्के फुल्के अंदाज़ में भी विषय की गंभीरता को समझेंगे। यह देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि लगभग सभी महिला और पुरुष मित्रों ने इसे स्पोर्ट्समेन स्पिरिट में लिया।

हालाँकि, अनअपेक्षित रूप से एक पुरुष मित्र ने किसी दूसरे मित्र के कंधे पर बन्दूक रखकर लगभग हमारे चरित्र पर ही ट्रिगर दबा दिया . पता नहीं जिंदगी को इतने रूखेपन से क्यों जीते हैं लोग .

बेशक अब ज़माना बदल रहा है . महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं। लेकिन अभी भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ पुरुषों की सोच महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा निम्न स्तर तक पहुँच जाती है। ऐसा ही एक क्षेत्र है , स्त्री पुरुष के सम्बन्ध। आज भी आम तौर पर स्त्रियाँ अपने परिवार, अपने पति और अपने बाल  बच्चों में मस्त रहकर ख़ुशी के अहसास का अनुभव करती है। लेकिन पुरुषों के बारे में ऐसा कहना सदैव संभव नहीं है।  क्योंकि इस पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों ने अपने मनोरंजन के लिए अनेक अवैध , अनैतिक और दुराचारी मार्ग अपना रखे हैं .

ऐसा ही एक मार्ग है वेश्यावर्ती। हालाँकि इस व्यवसाय में लिप्त लड़कियों और महिलाओं को दोष देना बड़ा आसान है लेकिन निश्चित ही इसके लिए जिम्मेदार तो पुरुष समाज ही है . सदियों से पुरुषों ने अपनी अनैतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए स्त्री जाति का शोषण  किया है . कभी जिस्म का सौदागर बनकर , कभी उपभोगता बनकर . नाबालिग लड़कियों का अपहरण कर बड़े बड़े शहरों में तथाकथित कोठों पर बिठाकर जो अमानवीय अत्याचार पुरुषों द्वारा किया जाता है , उससे तो भगवान भी अपनी कृति पर शर्मशार हो जाता  होगा .

लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है . बड़े बड़े फाईव स्टार होटलों, क्लबों और बार्स में ग्लैमर का मुखौटा ओढ़े जो लड़कियां पुरुषों को लुभाती हैं , वे कहीं से भी पीड़ित या शोषित नहीं लगती।  ज़ाहिर है,पैसे की चमक धमक  में अंधी होकर वे नैतिकता को ताक पर रखकर पुरुषों की कमजोरी का नाज़ायज़ फायदा उठाते हुए सम्पूर्ण समाज को दूषित करने में अपना उतना ही योगदान देती हैं जितना कि पुरुष .


डांस बार में अत्यंत लुभावनी पोशाक में थिरकती बालाओं को देखकर जो विचार मन में उभरे , वे स्वयं को विचलित करने वाले थे :

* जो लड़कियां पैसा कमाने के लिए वहां डांस कर रही थी , क्या उनके मात पिता जानते होंगे कि जिस कमाई पर वे घर चला रहे हैं या बेटी से गिफ्ट में पा रहे हैं , वह इस तरह कमाई जा रही है ! यदि जानते हैं तो सबसे गिरे हुए वे ही हैं . यदि नहीं जानते तो निश्चित ही बड़े धोखे में रह रहे हैं और दया के पात्र हैं .

* क्या पैसा कमाने के लिए इस राह पर चलकर ये लड़कियां सहानुभूति की पात्र बन सकती हैं !

* जो पुरुष यहाँ आकर और अपने से आधी उम्र की बालाओं से रूबरू होकर रोमांचित होते हैं , क्या अपना ज़मीर घर छोड़कर आते हैं !

* क्या पुरुष वास्तव में बहुयामी होते हैं -- एक साथ पति , पिता और रसिक होने का रोल निभा पाते हैं !


पुरुष के लिए पर स्त्री का आकर्षण सदैव प्रलोभित करने वाला रहा है . बड़े बड़े ऋषि मुनि भी इस आकर्षण से बच नहीं सके . वर्तमान परिवेश में पद , पैसा और पॉवर मनुष्य को राजसी प्रवृति की ओर ले जाता है . इसीलिए नेता , ब्यूरोक्रेट्स , बिजनेसमेन और सेलेब्रिटीज अपनी मनमानी करने में कामयाब रहते हैं .

गीता के सतरहवें अध्याय में बताया गया है , ब्रह्मचर्य के बारे में . इसके अनुसार गृहस्थ मनुष्य को पराई स्त्री को नहीं छूना चाहिए . और यदि सन्यासी हों तो स्त्री का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए .
यह अलग बात है कि आजकल सन्यासी भी नकली हैं और मनुष्य भी . इसलिए सभी ओर व्यभिचार का बोलबाला है . 

यह एक मृग मरीचिका है . जिंदगी के रेगिस्तान में दौड़ते जाइए , जो प्यास मिटा सके वो पानी कभी नहीं मिलेगा .

ये वो आतिश है ग़ालिब , जो जलाये न जले और बुझाये न बुझे . 

और अब एक लतीफ़ा जो लाफ्टर चेलेंज में टी वी पर सुना था और बहुत पसंद आया : 

बीमार पत्नि -- जी मैं मर गई तो आप क्या करेंगे ?
पति -- मैं तो पागल ही हो जाऊँगा . 
पत्नि -- लेकिन दूसरी शादी तो नहीं करोगे ना ?
पति -- नहीं पागल तो कुछ भी कर सकता है .   


Monday, October 8, 2012

पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की हेरा फेरी -- बार बार, लगातार !


कॉलिज के दिनों में एक जोक बहुत सुना जाता था -- दो सहेलियां आपस में बातें कर रही थी . एक ने कहा -- ये लड़के आपस में कैसी बातें करते  हैं ?  दूसरी बोली -- जैसी हम करते हैं . पहली सहेली बोली -- हा ! इतने बदमाश होते हैं !
आज तीस साल बाद वे सब लड़के लड़कियां पुरुष और महिलाएं बन चुके होंगे . लेकिन अब ऐसा महसूस होता है कि शायद पुरुष महिलाओं से कहीं ज्यादा बदमाशी करते हैं . फिर जाने महिलाएं क्यों बराबरी का दम भरती हैं .

इत्तेफाक से पुरुष सबसे ज्यादा बदमाशी महिलाओं के मामले में ही करते हैं . यही कारण है कि वेश्यावर्ती जैसा घिनौना व्यवसाय आदि काल से चला आ रहा है . राजा महाराजाओं का रनिवास हो , या अरब शेखों के हरम , मुग़लों के अत्याचार या फिर अंग्रेजों के ज़ुल्म . सदियों से औरत पुरुषों की हवस की शिकार रही हैं . आज भी सभी शहरों में मौजूद रेड लाईट एरिया , कोठे आदि मनुष्य के इसी शौक के अड्डे हैं .

कुछ ऐसे ही पुरुषों के मनोरंजन के अड्डे होते हैं -- डांस बार्स . कुछ वर्ष पहले मुंबई में सभी डांस बार्स को बंद कर दिया गया था . तब बड़ी संख्या में डांस गर्ल्स बेरोजगार हो गई थी . यहाँ दिल्ली में यह कल्चर या तो रहा नहीं या बस छुप छुप कर होता होगा . आज भी दिल्ली में शायद ही कहीं कोई डांस बार हो . हालाँकि यह भी हो सकता है कि हम ही अनभिज्ञ हों .

अपनी विदेश यात्रा के दौरान एक रात 10 बजे डिनर के बाद सभी महिलाएं शौपिंग मोड में आ गईं। वैसे भी  मॉल्स 11 बजे तक खुले होने के कारण महिलाओं के लिए इस प्रलोभन से बचना मुश्किल था। जैसा कि आम तौर पर होता है, मानव प्रजाति हो या कोई अन्य , बच्चे भी अक्सर मां के पीछे पीछे हो लेते हैं . अब रह गए अकेले हम तीन दोस्त। और लगे सोचने कि हम क्या करें, कहाँ जाएँ .

आखिर प्रोग्राम बना कि चलो बार में बैठा जाये . वैसे भी डिनर कर ही चुके थे , एक आध बियर ही पी जा सकती थी। किसी ने बताया -- यहाँ डांस बार्स भी होते हैं जहाँ ड्रिंक्स के साथ डांस देखने का लुत्फ़ उठाया जा सकता है . हमारे लिए तो यह बिल्कुल नया अनुभव था . इसलिए टैक्सी वाले को कहा, चलो ले चलो किसी ऐसे ही बार में .

ज़ाहिर था, वहां ऐसी जगहों की कोई कमी नहीं थी , इसलिए पांच मिनट में ही पहुँच गए एक डांस बार में . प्रवेश करते ही लगा जैसे किसी अंधेर नगरी में आ गए। पहले तो डिम लाईट में देखना ही मुश्किल हो रहा था . किसी तरह वेटर ने ही टेबल दिखाई और हम बैठ गए जम कर . सामने एक स्टेज बनी थी जिस पर तेज रौशनी में एक लड़की डांस कर रही थी। पीछे बैठने की जगह बनाई गई थी जहाँ 7-8 लड़कियां और बैठी थीं। देखने में सभी 20-25 वर्ष की लग रही थी , हालाँकि चेहरे की भव्य साज सजावट के पीछे असली उम्र का पता लगाना मुश्किल था। देखने में सभी भारतीय लग रही थी और हिंदी फिल्मों के गानों पर थिरक रही थी .

बैठते ही एक के बाद एक मेनेजर और वेटर्स की लाइन लग गई . सबने  आकर सबसे हाथ मिलाकर हमारा अभिवादन किया. सच पूछिए तो यह अप्रत्यासित स्वागत हमें अस्वाभाविक और असहज सा लगा . वैसे भी एक वेटर से हाथ मिलाने का कोई औचित्य समझ नहीं आ रहा था। उधर स्टेज पर एक लड़की डांस कर बैठ जाती और दूसरी शुरू हो जाती। यह क्रम लगातार चल रहा था।

इसी असमंजस के बीच हमने बियर का ऑर्डर दिया और मेज पर रखे ड्राई फ्रूट्स चबाने लगे जिनमे काजू या बादाम कम और सख्त खोल वाले पिस्ता ज्यादा थे जिन्हें तोड़ने में बड़ी दिक्कत हो रही थी . थोड़ी देर तक कई वेटर्स हमारे इर्द गिर्द सावधान की मुद्रा में खड़े रहे। फिर हमें खाने और पीने में आत्मीयता से व्यस्त देखकर चुपचाप खिसक लिए . अब तक हमें भी कुछ कुछ समझ आने लगा था उनका व्यवहार और डांस बार का कारोबार।

वहां का माहौल देखकर हमें मुंबई के सुप्रसिद्ध कवि आसकरण अटल जी की एक कविता के कुछ अंश याद आ  गए :

लोग आ रहे हैं , जा रहे हैं
और वापस जा रहे हैं .
( हम तो बस पी खा रहे हैं )

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
वैसे तो हर जगह लड़ाई ,
पर हाइवे पर ( बार में ) भाई भाई .

वहां शायद खाने पीने वाले तो बस हम ही थे . बाकि सब तो देखने वाले थे . इस बीच दो स्थानीय निवासी सेठ लोग स्टेज के बिल्कुल सामने आकर बैठ गए . उनमे से एक विधिवत रूप से स्थानीय वेष भूषा में था जबकि दूसरा आम कपड़ों में . सुसज्जित सेठ ने हुक्का मंगवाया और कश लेने लगा . लेकिन दूसरा खुदा का बंदा अपनी नज़रें स्टेज पर ही गडाए था . स्टेज पर बैठी एक लड़की का सारा ध्यान अब इस सेठ पर ही था . मूक बधिरों की भाषा में खुलेआम बातचीत चल रही थी . उधर थोड़े थोड़े अन्तराल पर एक दो लड़कियां गायब हो   जाती और फिर कुछ समय बाद लौट आती .

वहां क्या गोरखधंधा चल रहा था , हमारे लिए तो यह अटकलबाज़ी का ही विषय था .

आखिर, दो बियर लेने के बाद दिल में कई सवाल लिए हमने प्रस्थान करना ही उचित समझा और टैक्सी पकड़ वापस लौट आए अपने आशियाने की ओर . होटल पहुंचकर पहला झटका तब लगा जब देखा कि जिस नाम के बार में हम होकर आए थे उसी नाम का बार तो हमारे ही होटल में था . यानि खामख्वाह टैक्सी का भाड़ा दिया . उत्सुकतावश अन्दर जाकर देखा तो यहाँ भी ठीक वही दृश्य पाया .

लेकिन दूसरा झटका तब लगा जब बच्चों ने आकर बताया कि उन्होंने हमें बहुत ढूँढा , यहाँ तक कि बार में भी देखा लेकिन हम नहीं मिले . अब हम उन्हें कैसे समझाते कि हम थे तो उसी बार में लेकिन वह बार ही वहां नहीं था , कहीं और था।

अंत में , आखिरी झटके के लिए हम चल दिए अपने अपने कमरे की ओर . अन्य दोस्तों का क्या हस्र हुआ , यह तो हम नहीं जानते लेकिन जब हमने श्रीमती जी को सारी बात बताई तो हमने मिलकर जमकर ठहाका लगाया .

यह अलग बात है कि जो सवाल मन में उठे , उनका ज़वाब शायद कभी न मिल पाए।    

नोट :यह पोस्ट कुछ लोगों की संवेदनाओं को आहत कर सकती है . कृपया इसे इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म ही समझें . 

Thursday, October 4, 2012

सफ़ारी की बातें और अरबी रातें ---भाग 1


दुबई टूर  के अंतिम चरण में आता है डेजर्ट सफ़ारी . शहर से क़रीब 60-70 किलोमीटर दूर बने हैं -सेंड ड्यून्स यानि रेत के टीले। इन टीलों पर फर्राटे से दौड़ती गाड़ी में बैठकर  अनोखा रोमांच महसूस होता है।  




हाइवे पर 140 की स्पीड से ड्राईव करते हुए ड्राईवर ने 40  में पहुंचा दिया इस स्थान पर जहाँ  गाड़ियाँ एक साथ काफिला बनाकर चलती हैं . ऊपर नीचे हिचकौले खाते हुए जब गाड़ी ड्युन्स के टॉप पर जाकर नीचे आती है तब जान सी निकल जाती है . लगता है जैसे अभी पलटी। 




इतना समतल स्थान तो कम ही  मिलता है।




करीब 2-3 किलोमीटर के बाद बीच रेगिस्तान में पहुँच कर गाड़ी से उतर जाते हैं . जहाँ रेत में बनी ये लहरें मन को बहुत भाती हैं।  




लेकिन जल्दी ही इंसानी पैरों तले रोंद दी जाती हैं।





और रह जाते हैं ये निशान , जो निश्चित ही अस्थायी होते हैं . तेज हवा के साथ ये निशान ही नहीं , ड्युन्स भी अपना अस्तित्व खो जाते हैं . 



रेतीली लहरों के साथ गाड़ियों के निशान .




                                   
एक जगह आकर सारा कारवां रुक जाता है .





सब गाड़ियों से बाहर निकल पड़ते हैं और पाउच से कैमरे .                                


सूर्यास्त से पहले गाड़ियाँ निकल पड़ती हैं , कैम्प साईट की ओर। यह शहर की ओर कुछ किलोमीटर जाने पर आता है . यहाँ मनोरंजन के लिए कई साधन जुटाए गए हैं।


  

कैम्प के बाहर एक तरफ स्कूटर की सवारी हो रही थी , दूसरी तरफ ऊँट की . यहाँ सभी आकार और प्रकार के रंग बिरंगे लोग देखने को मिले।  





शाम की प्रष्ठभूमि में ऊँट की सवारी।





अँधेरा हुआ तो बत्तियां जल गईं। कैम्प के गेट पर दोनों ओर बनी थी , वी आई पी गैलरी।




अन्दर का दृश्य। 




एक तरफ बना था यह हुक्का बार। आखिर अरबी रात का मज़ा तो ऐसे ही आता है। हालाँकि , हुक्का पीने वाला  तो कोई इक्का दुक्का ही था .





बीच में बनी स्टेज के चारों ओर दो घेरों में रेडियल रोज में मेज लगी थी जिनके साथ बैठने के लिए गद्दे बिछे थे जिन पर बैठकर खाना खाते हुए डांस देखने का प्रायोजन था। पहले एक पुरुष ने अपने जौहर दिखाए .   





फिर बारी आई इस कमसिन , गोरी नवयौवना की जिसका सभी को इंतजार था . सुना था , यहाँ बेली डांस दिखाया जाता है . लेकिन गोरी चमड़ी के अलावा डांस तो नाममात्र ही था .


डांस का एक छोटा सा नमूना आपके लिए संजोया है क्योंकि अब तक कैमरे की बैटरी ख़त्म होने लगी थी . 



और इस तरह रेतीले जंगल में मंगल मनाकर हम करीब रात 12 बजे होटल पहुंचे . 

नोट: अगली और समापन किस्त में अरबी रातें भाग 2 में पढ़िए जो पहले कभी नहीं लिखा गया .


Monday, October 1, 2012

मेहनत और हिम्मत से विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है .


इससे पहले कि हम आपको यह बताएं कि दुबई से हमने क्या सीखा, थोड़ी और मस्ती हो जाये .



इनडोर एक्वेरियम में नाव की सवारी करने से पहले हमने पूजा अर्चना करना सही समझा . आखिर विदेश में चुल्लू भर पानी में डूबना कौन चाहेगा . हालाँकि हमने लोगों को ऐसा करते हुए भी देखा . ( यह शायद समझ न आए )


                                         टॉपर्स एट दा टॉप


                                   

                                         यह फोटो हमने स्वयं खिंची है .





                                         पानी में बुड्ढा मस्ती .





                                          महिलाएं तो ऐसे ही काम चला लेती हैं .




लेकिन पुरुषों को कौन रोक सकता है . फिर कैसे कहें पुरुष और महिला में कोई फर्क नहीं होता .


मस्ती के बाद अब कुछ काम की बात हो जाए :

                                           
 स्वच्छता :

दुबई की  आबादी 2 मिलियन से भी कम है जिसमे सिर्फ 20 % ही  वहां के मूल निवासी हैं . शेष 80 % दूसरे  देशों से आए हुए कामकाजी लोग हैं .  इनमे मुख्यतया भारतीय , पाकिस्तानी , बंगला देसी ,  फिलिस्तीनी और ईरानी लोग काम की तलाश में यहाँ भीषण गर्मी में मेहनत करते हैं।

लेकिन जो बात सबसे ज्यादा  प्रभावित करती है , वह है यहाँ की सड़कों पर साफ़ सफाई . गन्दगी फैलाना यहाँ भी अपराध है और वहां भी . लेकिन जो लोग यहाँ बेतकल्लुफी से गन्दगी फैलाते हैं , वही वहां जाकर अच्छे नागरिक बन जाते हैं .

वहां कोई सड़क पर या दीवारों पर या कोने में पान की पीक नहीं मारता . न ही खुले में पेशाब की धार मारता . यह अलग बात है कि वहां की गर्मी में और पानी की कमी से इसकी नौबत ही नहीं आती .

ट्रैफिक :

सड़क पर बस बड़ी बड़ी गाड़ियाँ ही दिखती हैं . कोई दोपहिया नहीं , न रिक्शा , न  साइकिल . बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी का तो सवाल ही नहीं उठता। जेब्रा क्रॉसिंग पर पहला हक़ पैदल यात्री का होता है। कूद फांद कर कोई सड़क पार नहीं करता .

कारों की फिटनेस हर वर्ष लेनी पड़ती पड़ती है . उसी समय सारे चलान भी भरने पड़ते हैं जिसकी रकम बहुत ज्यादा होती है .  इसलिए जो ड्राइवर यहाँ अपनी मर्ज़ी से गाड़ी चलाते हैं , वहां जाकर विश्व के सबसे शरीफ इंसान बन जाते हैं .

टैक्सी चालक के साथ कोई मगजमारी नहीं करनी पड़ती . गाड़ी के अन्दर ही मीटर लगा लगा होता है जो न सिर्फ काम करता है बल्कि रीडिंग भी सही देता है . 
                         


                     

पूरे शहर में ऊंची ऊंची बिल्डिंग्स और होटल्स की भरमार है . चमचमाती बिल्डिंग्स पूर्णतया सुरक्षित तरीके से बनाई गई हैं . यहाँ बिजली भी कभी नहीं जाती।


लेकिन ऐसा नहीं है कि सब अच्छा ही अच्छा है . पानी 30 रूपये और पेट्रोल 25 रूपये लीटर मिलता है . 
सभी दफ्तर के काम मूल निवासियों के जिम्मे हैं जबकि मजदूरी तथा अन्य मेहनत के काम बाहर के लोग करते हैं . बेहद गर्मी में काम भी सुबह शाम और रात में किये जाते हैं . 

यहाँ महिलाओं को बुर्के में रहना पड़ता है। खाना खाते समय भी पर्दा मूंह पर ही रहता है . हालाँकि उनको आदत तो पड़ ही जाती होगी . 

कुल मिलाकर दुबई वालों ने अपनी मेहनत से रेगिस्तान में महल और भव्य भवन खड़े करके यह साबित कर दिया कि मेहनत और हिम्मत से विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है .     


 नोट : दुबई के कुछ और चित्र यहाँ देखें .