Monday, November 26, 2012

घर के कुछ काम तो ऑफिस में करने दीजिये ---


बहुत समय से हास्य काविता लिखने का समय और विषय नहीं मिल रहा था. हालाँकि दीवाली पर उपहारों के आदान प्रदान पर लिखने का बड़ा मूड था. इस बार अवसर मिल ही गया. आप भी आनंद लीजिये : 


जब भी दीवाली, सर पर चढ़ आती है 
साहब के दिल की, धड़कन बढ़ जाती है।   

जाने इस बार कितनी गिफ्ट्स आयेंगी 
कम रह गई तो घर में, क्या इज्ज़त रह जाएगी।

दीवाली की गिफ्ट्स का फंडा भी सिंपल होता है 
भई यह तो अफसरों का, स्टेटस सिम्बल होता है।   

पिछले साल दीवाली पर हो गया ट्रांसफर
दीवाली  की गिफ्ट,  आधी रह गई घटकर।  

पहले जो लोग तीन तीन पेकेट लेकर आये थे
अब वो तीन महीने से नज़र तक नहीं आये थे।   

लेन देन का तो सारा हिसाब ही खो गया 
ऊपर से पत्नी का भी मूड ख़राब हो गया।   

तुनक कर बोली -- यदि दफ्तर में और टिक जाते 
तो निश्चित ही दस बीस पेकेट, और मिल जाते ।   

गिफ्ट की संख्या रूपये की कीमत सी घट गई 
अज़ी पड़ोसी के आगे अपनी तो नाक ही कट गई।   

आप यहाँ हारे नेता से अकेले पड़े हैं 
पड़ोसी के द्वार पर देखो, दस बन्दे खड़े हैं।   

बाजु वाले शर्मा जी भी बने बैठे हैं शेर 
घर के आगे लगा है, खाली डिब्बों का ढेर।  

सा'ब को अब फिर लग रहा था घाटे का डर
इस बार फिर आ गया था, ट्रांसफर का नंबर।   

मन में ऊंचे नीचे राजसी विचार आने लगे 
सपने में फिर रंग बिरंगे, उपहार आने लगे।    

नए दफ्तर में सा'ब ने शान से मिठाई मंगवाई 
फिर सारे स्टाफ को बुलाकर, शान से दी बधाई।   

सूट बूट पहनकर बैठे लगाकर रेशमी टाई  
पर ताकते रह गए, गिफ्ट एक भी ना आई।   

बैठे रहे अकेले कुर्सी पर लेते हुए जम्हाई  
खाली एस एम् एस पर ही मिलती रही बधाई।    

खीज कर सा'ब ने अपने पी ऐ को डांट लगाई
उसने जब बताया , तो ये बात समझ में आई।

जो कोंट्रेक्टर सप्लायर दफ्तर में चक्कर लगाते थे
वही तो दीवाली पर मोटी मोटी गिफ्ट लेकर आते थे।    

लेकिन अब  बेचारे सारे क़र्ज़ में धंसे पड़े है 
डॉलर के चक्कर में सबके पैसे फंसे पड़े है।  

इनकी सेवाओं का तो हम पर ही क़र्ज़ है 
सर आपका लेने का नहीं , देने का फ़र्ज़ है।

पुरुषों को दवा दारू की दो  घूँट देनी चाहिए 
महिलाओं को लेट आने की, छूट देनी चाहिए।

घर के कुछ काम तो ऑफिस में करने दीजिये
खुद भी करिए हमें भी, मनमानी करने दीजिये।

सरकारी नौकर तो बेचारा बेसहारा होता है ,
दफ्तर में बॉस और घर में बीबी का मारा होता है।

यह सुनकर बॉस का दिल भावनाओं से भर आया,
इसलिए सारे स्टॉफ को बुलवाकर लंच  करवाया।


कभी दीवाली पर मिलना, मिलकर बातचीत करना 
और भेंट का आदान प्रदान, दिलों में भरता था प्यार।  
अब घर बैठे ही मोबाईल या नैट पर  करते हैं चैट,  
और दीवाली के उपहार, बन कर रह गए हैं व्यापार।   


नोट : कृपया इसे कवि की कल्पना ही समझें . इसका सम्बन्ध किसी भी जीवित या अजीवित व्यक्ति या घटना से नहीं है.  

Friday, November 23, 2012

कैसा लगता होगा पल पल मौत का इंतज़ार करना ?


एक डॉक्टर के रूप में हमने अनेक मौतें देखी हैं. कभी मृत शरीर , कभी अंतिम सांसें लेता रोगी तो कभी असाध्य रोग से पीड़ित बीमार जिसके बचने की सम्भावना न के बराबर . कोई हमारे ही हाथों में दम तोड़ता , किसी को बचा पाने में सफल. एक डॉक्टर के लिए यह सब एक रूटीन सा बन जाता है. इसमें भावनाओं से ज्यादा विवेक, बुद्धि और ज्ञान का इस्तेमाल होता है . इसलिए डॉक्टर अक्सर ऐसी स्थिति में इमोशनल होकर काम नहीं करते. मृत्यु को इतने करीब से शायद कोई और नहीं देख पाता होगा. 

असाध्य रोग से ग्रस्त एक रोगी को भी डॉक्टर्स कभी सच्ची , कभी झूठी दिलासा देते हुए एक आस बनाये रखते हैं. उम्मीद बनी रहने से रोगी का मनोबल बना रहता है. इस कारण, भले ही मृत्यु को टाला नहीं जा सकता हो , मृत्यु के डर को तो कम किया ही जा सकता है. रोगी और रोगी के रिश्तेदारों को भी मानसिक रूप से तैयार होने का समय मिल जाता है. आखिर , मृत्यु एक अटल सत्य है. 

कसाब को फंसी देने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठना लाजिमी है की क्या मृत्यु दंड होना चाहिए. इस विषय पर बहस चलती रही है और चलती रहेगी . विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक है. हालाँकि , यह सच है की मनुष्य अनुशासित तभी रहता है जब उसे अनुशासन तोड़ने पर सज़ा का डर होता है. सज़ा में मौत की सज़ा का डर सबसे ज्यादा रहता है. और मौत की सज़ा में फांसी शब्द सबसे ज्यादा डरावना लगता है. गले में रस्सी का फंदा डालकर जब लटकाया जाता है , तब शरीर के बोझ से गर्दन की रीढ़ की हड्डी अचानक टूट जाती है और मनुष्य के शरीर का मस्तिष्क से सम्बन्ध टूटने से मृत्यु हो जाती है. बेशक ऐसा एक पल में हो जाता है , इसलिए व्यक्ति को दर्द या तकलीफ महसूस करने का समय ही नहीं मिलता. 

ऐसे में एक सवाल मन में उठता है. जहाँ एक रोगी को मृत्यु से पहले अंतिम साँस तक जिंदगी की उम्मीद बनी रहती है , वहीँ फांसी का इंतज़ार करते कैदी को मृत्यु सामने साफ दिखाई देती है. इस हालात में उसके मन में क्या विचार आते होंगे ? कैसा लगता होगा पल पल मौत का इंतज़ार करना ? क्या कसाब जैसे खुंखार आतंकवादी को भी मौत का खौफ महसूस हुआ होगा ?  


Tuesday, November 20, 2012

आम आदमी का मेवा -- मूंगफली जिसका सीजन आ रहा है ....


आम आदमी तो आम ही होता है लेकिन उसकी पसंद और पहुँच खास ( विशेष ) वस्तुओं तक ही सीमित होती है . हालाँकि जो वस्तु खास लोगों के लिए आम होती है , वही आम लोगों के लिए खास होती है . यदि ड्राई फ्रूट्स को देखें तो आम आदमी के लिए मूंगफली ही मेवे का काम करती है . काजू , बादाम , किसमिस और अखरोट आदि भला आम आदमी की किस्मत में कहाँ .

लेकिन क्या हुआ यदि आप इन मेवों से वंचित रहते हैं . मूंगफली यानि  पीनट्स भी तो एक मेवा ही है . और देखिये कितने गुण समाये हैं इस आम आदमी के मेवे में :

पोषक तत्व :

मूंगफली में 25 % प्रोटीन होती है जो सब मेवों में सबसे ज्यादा है . साथ में  करीब २० % कार्बोहाइड्रेट और ४८ % फैट होता है . इसलिए मूंगफली से ऊर्जा अत्यधिक मात्रा में मिलती है जो ५७० केल्रिज प्रति १०० ग्राम होती है .  ज़ाहिर है , इसे कम मात्रा में ही खाया जा सकता है . 

विटामिन और खनिज पदार्थ : 

विटामिन बी कॉम्प्लेक्स ,  सी , फोलेट और लोह तत्व , मैग्निसियम , पोटासियम, फोस्फोरस, कैल्सियम और जिंक काफी मात्रा में मिलते हैं . 

एंटीऑक्सीडेंट्स  :

प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो शरीर को निरोग बनाये रखने में सहायक सिद्ध होते हैं . 

उपयोग: 

* मूंगफली में प्रोटीन और केल्रिज भरपूर होने के कारण यह बच्चों , गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाती माताओं के लिए सर्वोत्तम आहार है . इससे इन में रक्त की कमी नहीं होती और प्रतिदिन की ज़रुरत पूरी होती है . 

* मूंगफली के तेल में मोनो और पॉली अनसेचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक होती है . इसलिए यह कॉलेस्ट्रोल को कम रखता है . इसलिए हृदय रोगियों के लिए भी उपयुक्त रहता है। 

* इसमें फाईबर की मात्रा अधिक होने से पेट के लिए सही रहता है और कब्ज़ को दूर रखने में सहायक है। 

* इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और अन्य प्रतिरोधक पदार्थ कैंसर और हृदय रोग जैसे घातक रोगों से बचाव करते हैं . 

अत : मूंगफली बच्चों , बड़ों और महिलाओं सभी के लिए एक बढ़िया और स्वास्थ्यवर्धक आहार है। विशेषकर सर्दियों में इससे मिलने वाली ऊर्जा हमें भरपूर स्वाद के साथ शक्ति भी प्रदान करती है। गुड़ और मूंगफली से बनी पट्टी न सिर्फ खाने में मज़ा आता है , बल्कि स्वस्थ जीवन के लिए भी लाभकारी है। 

मूंगफली को सर्दियों में गर्मागर्म खाने में बड़ा आनंद आता है . यह अलग बात है कि छिलके फेंककर हम सड़कों पर गन्दगी ज़रूर फैलाते हैं . मूंगफली की गीरी पूरे वर्ष पैकेट बंद मिलती है . हालाँकि नमक वाली या तली हुई मूंगफली बी पी के रोगियों को कम ही खानी चाहिए . इसके अलावा पीनटबटर के रूप में भी टोस्ट पर लगा कर खाया जा सकता है। मूंगफली की पट्टी के तो क्या कहने , खाने में भी स्वाद और शक्तिवर्धक भी। 

अंत में : पीने वालों को भी पीनट्स चबाने से पीने का मज़ा और भी बढ़ जाता है। 

नोट: मूंगफली से कुछ लोगों को एलर्जी हो सकती है। यह एलर्जी प्रोटीन से होती है। ऐसे में नहीं खाना चाहिए। इसके अलावा इससे कुछ लोगों को थायरोय्ड सम्बंधित रोग भी हो सकता है। हालाँकि यह रिस्क न के बराबर होता है .    

Saturday, November 17, 2012

अपने पूर्वजों जैसी हरकत करना भी एक कला है ---


आपने बंदरों को कूदते फांदते अवश्य देखा होगा . कैसे एक मकान की छत से दूसरे मकान की छत पर या एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूद फांद करते रहते हैं . इन्हें देखकर कई बार लगता है -- काश हम भी ऐसा कर पाते. हालाँकि कहते हैं , हमारे पूर्वज भी तो बन्दर ही थे. लेकिन फिर मानव ने विकास की पथ पर अग्रसर होते हुए अपने लिए सभी सुख साधन जुटा लिए. अब उसको इस तरह कूद फांद करने की आवश्यकता नहीं होती. लेकिन अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं , जो बंदरों की तरह हरकतें करके अपनी जीविका चलाते हैं.  इसे आप उनका हुनर भी कह सकते हैं. लेकिन आप देखेंगे तो हैरान रह जायेंगे.  

अब इस वीडियो में देखिये , कैसे यह युवक एक पेड़ पर चढ़ता है , और पलक झपकते ही कैसे दूसरे पेड़ से होते हुए , तीसरे पेड़ से नीचे उतरता है. 


ज़रा कोशिश कीजिये और देखिये , क्या आप पकड़ पाते हैं उसे नीचे उतरते हुए. 

और अब बताइए , यह नज़ारा कहाँ का हो सकता है. ज़ाहिर है, यह प्रदर्शन इस युवक का रोज का काम है. जो लोग पर्यटन के शौक़ीन हैं , वे इसे अवश्य पहचान सकते हैं .



कल्यु के लिए इस फोटो को देखिये।

नोट : यह स्थान निश्चित ही अपने ही देश में है. 


Wednesday, November 14, 2012

दे दनादन -- चाइनीज़ बमों से मारे हिन्दुस्तानी मच्छर !


इस वर्ष दीवाली से ठीक पहले सप्ताहंत आने से दीवाली मनाना थोड़ा आसान रहा .  अक्सर इन दिनों में सडकों और बाज़ारों में  भारी भीड़ रहती है जिससे अक्सर भारी जाम लग जाते हैं।  घंटों जाम में फंसे रह कर जश्न मनाने का जोश ही ठंडा पड़ जाता है। ऐसा लगता है जैसे सारा शहर ही सडकों पर निकल पड़ा हो। 
आइये देखते देखते हैं ,  दीवाली के विविध आयाम :            


शनिवार : को अस्पताल में आधी छुट्टी होती है। 


अस्पताल में स्टाफ  ने कमरों को खूबसूरती से सजाकर रंग जमा दिया। ऊपर लैब का एक दृश्य।





हमारे कार्यालय को भी तबियत से सजाया गया था।
ऐसे में हमने भी स्टाफ के लिए एक छोटी सी पार्टी आयोजित कर सब को खुश कर दिया। यह अलग बात है कि उन्हें बदले में हमारी कविता झेलनी पड़ी। हालाँकि यह एक छोटी सी ही कीमत थी चुकाने के लिए।


रविवार : 


शाम को सी एस ओ आई में दीवाली मेले का आयोजन किया गया था। यहाँ अन्य संसाधनों के अतिरिक्त एक ग़ज़ल संध्या का आयोजन किया गया था। दिल्ली के सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायक श्री राहत अली खान ने अपनी ग़ज़लों से सबका मन मोह लिया। 




इस बार क्लब को बहुत बढ़िया तरीके से सजाया गया था। हरे भरे लॉन और पार्किंग को खाली कराकर विस्तार से मेले का आयोजन किया गया था। खाना और पीना , दोनों बढ़िया थे। बस पीने के लिए साकी स्वयं ही बनना पड़ा। ( जूस की बात कर रहे हैं )

सोमवार : 

कई दिनों से मॉल जाने की सोच रहे थे। आखिर सोमवार तक सडकों पर यातायात कम हो गया था। इसलिए नोयडा के ग्रेट इण्डिया प्लेस मॉल की सजावट भी देखने लायक थी।  





रंग बिरंगी लाइटों से सजा मॉल ऐसा अहसास दिला रहा था जैसे हम किसी विदेशी मूल में घूम रहे हों।


हालाँकि मॉल में भीड़ भड़क्का बिल्कुल नहीं था।



हमें तो यह सकून ही दे रहा था।


छोटी दीवाली के दिन सोसायटी में भोज का इंतजाम किया गया था। अड़ोस पड़ोस के सभी पड़ोसियों से एक ही जगह मिलकर दीवाली मुबारक हो गई। फिर देर रात तक बच्चे डी जे पर थिरकते हुए मस्ती करते रहे।


दीवाली : 

सरकार ने 10 बजे के बाद पटाखे न चलने का आह्वान किया था। लेकिन-- इट हेपंस ओनली इन इण्डिया -- यहाँ सरकार की सुनता ही कौन है। रात 8 बजे तक शांति सी महसूस हो रही थी। लगा जैसे दिल्ली वाले समझदार हो गए हैं। लेकिन फिर ऐसा जुनून शुरू हुआ कि 11 बजते बजते चरम सीमा पर पहुँच गया।



हम तो अपनी बालकनी से बस उड़ते हुए धुएं को देखते रहे। ठा ठा ,  धां धां , धड़ाम की आवाज़ों के बीच देखते रहे दूसरों को फूंकते हुए, आराम से कमाए गए हराम के पैसे को . 




लेकिन दीपों और लाइटों से होती हुई जगमगाहट मन को बहुत सुख प्रदान कर रही थी।



वैसे तो दिल्ली के अस्पतालों को पटाखों से जले हुओं के इलाज के लिए पूर्ण रूप से तैयार किया गया था , लेकिन ऐसा होने से बचाना तो डॉक्टर्स के हाथ में नहीं था। कहीं कहीं दुर्घटनाएं भी हुई।




बिल्कुल साफ दिखने वाली सड़क पर अब घना धुआं छा गया था। आखिर यह तो होना ही था।
अफ़सोस तो यह है कि फूलझड़ी और अनार जिन्हें सुरक्षित माना जाता है , वे ही सबसे ज्यादा धुआं छोड़ते हैं।
हालाँकि ध्वनि प्रदूषण होता है चाइनीज़ बमों से।

आखिर हमने दिखा दिया कि हम हिन्दुस्तानी सबसे ज्यादा धार्मिक प्रवृति के लोग होते हैं। वैसे यदि आप किसी से पूछें कि आप पटाखे क्यों छोड़ रहे हैं तो शायद ही कोई इसका कारण बता पाए । ज़ाहिर है, सब छोड़ रहे हैं इसलिए हम भी छोड़ रहे हैं। बस यही मॉब मेंटालिटी हमें दूसरों से अलग बनाती है।  


Saturday, November 10, 2012

मैं तो पटाखे से ही मर जाऊँगा , बम रहने दे ---


पुरानी हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय खलनायक अजित अक्सर जब हीरो को पकड़ लेते तो कहते -- रॉबर्ट, इसे गैस चैंबर में डाल दो। कार्बन डाई ऑक्साइड इसे जीने नहीं देगी और ऑक्सीजन इसे मरने नहीं देगी। आजकल दिल्ली शहर ऐसा ही गैस चैंबर बना हुआ है। नवम्बर शुरू होते ही दिल्ली को ऐसी सफ़ेद चादर ने घेर लिया जैसी वो कौन थी जैसी पुरानी हिंदी संस्पेंस फिल्मों में दिखाई देती थी। फर्क सिर्फ इतना है कि उन फिल्मों में नकली धुंध का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन यहाँ न सिर्फ असली धुंध है बल्कि ज़हरीली भी है। दूसरे, फिल्मों में नायक सारी दीवारें तोड़कर बाहर निकल आता था, लेकिन असल जिंदगी में आम आदमी के पास बच कर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता।  

धुंध : दरअसल इसे धुंध कहना ही सही नहीं है। इसे स्मॉग कहा जाता है। यानि यह स्मोक ( धुएं ) और फॉग ( धुंध ) का मिश्रण है। दिल्ली में सर्दी शुरू होते ही वायु में वाष्प की मात्रा बढ़ने लगती है जो धुएं से मिलकर धुंधलका बन जाती है। वायु का  बहाव न होने से यह पृथ्वी की सतह पर ही टिकी रहती है। लेकिन इस वर्ष  अमेरिका में आए सैंडी तूफ़ान की वज़ह से देश में नीलम नाम के तूफ़ान का कहर दिल्ली में भी दिखाई दे रहा है. इसकी वज़ह से वायुमंडल में अत्यधिक वाष्प आने से असमय ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है.   

लेकिन सबसे चिंताज़नक बात यह है की इस स्मॉग में ज़हरीली गैसों की मात्रा बहुत ज्यादा पाई गई है. धूल और धूएँ के महीन कणों के अलावा नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड , कार्बन मोनो ऑक्साइड, बेंजीन और ओजोन की अत्यधिक मात्रा वायुमंडल को एक गैस चैंबर बना रही हैं। 


नतीजा : 
साँस लेने में बड़ी कठिनाई पैदा हो हो रही है. घर से बाहर निकलते ही एक घुटन सी महसूस होती है। 
* आँखों में जलन। 
* गले में खराश से लेकर साँस की परेशानी होने का खतरा बना रहता है। 
* दिल के रोगियों को विशेष खतरा हो सकता है।  

ऐसे में क्या किया जाये ? 

* जहाँ तक हो सके , घर से बाहर ही न निकलें . लेकिन यह संभव नहीं . इसलिए ज़रुरत हो , तभी बाहर जाएँ. आखिर सबसे कम प्रदुषण घर में ही हो सकता है.
* आँखों को दिन में कई बार ठन्डे पानी से धोएं . इससे जलन में आराम आएगा. 
* दिन में कई बार कुल्ला या गरारे करें जिससे गला ख़राब होने से बच सके. 
* पानी और अन्य तरल पदार्थ जैसे चाय आदि पीते रहें जिससे शरीर का हाईडरेशन बना रहे . 
* जिन्हें साँस की शिकायत  रहती हो , उन्हें मूंह पर मास्क लगाकर चलना चाहिए. 
ऐसा करने से थोड़ी राहत तो मिलेगी लेकिन यह इस समस्या का स्थायी निवारण नहीं है. इसके लिए हमें बढ़ते प्रदुषण के कारणों पर अंकुश लगाना होगा. 

प्रदुषण के कारण : 

दिल्ली में करीब २ करोड़ जनता और ७० लाख वाहन साँस ले रहे हैं . इन से निकलती गैसें वातावरण में फैलकर प्रदुषण को बढ़ा रही हैं. अब मनुष्यों की सांसों से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड को तो नहीं रोका जा सकता लेकिन वाहनों से फैलते प्रदुषण को अवश्य रोका जा सकता है. पता चला है की दिल्ली में हर रोज करीब ११०० नई कारों का पंजीकरण होता है . इनमे से ६० % डीज़ल से चलने वाली कारें हैं . ज़ाहिर है , सी एन जी आने के बावजूद, डीज़ल वाहनों से फैलने वाला प्रदुषण अभी भी  बना हुआ है . इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने की ज़रुरत है. 

दिवाली :     

वर्तमान परिवेश में दिवाली का आना एक नासूर सा लग रहा है . ज़रा सोचिये , जब अभी साँस नहीं आ रही तो दिवाली के दिन क्या हाल होगा . दिवाली के दिन दिल्ली वाले पागल से हो जाते हैं और पटाखे और बम  छोड़ने की ऐसी होड़ सी लग जाती है की देखकर इन्सान के वहशी होने का साक्षात् प्रमाण सा दिखाई देने लगता है . ऐसे में साँस , दिल के रोगियों और अन्य गंभीर रूप से बीमार लोगों को कितनी मुश्किल होती होगी , यह कोई नहीं सोचता.
क्या अभी और कमी है प्रदुषण में जिसे दिवाली पर पूरा करने की ज़रुरत है ? 
फिल्मों के हीरो तो हीरो होते हैं, गैस चैंबर से बच निकलते हैं . लेकिन एक आम आदमी कहाँ जायेगा साँस लेने , जब प्रदुषण से साँस आनी ही बंद हो जाएगी ?    
आखिर यह भी क्या खेल हुआ , धुआं और शोर फ़ैलाने का ! 

ऐसे में एक हास्य कवि -- पोपुलर मेरठी का एक शे'र याद आता है : 

मैं हूँ जिस हाल में , ऐ मेरे सनम रहने दे , 
चाकू मत दे मेरे हाथों में , कलम रहने दे।  .
मैं तो शायर हूँ, मेरा दिल है बहुत ही नाज़ुक 
मैं पटाखे से ही मर जाऊँगा , बम रहने दे।

एक अपील : दिवाली भले ही हम हिन्दुओं का सबसे बड़ा और पावन पर्व है , लेकिन यह दिवाली यदि हम बिना बम पटाखों के मनाएं , तो शायद मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार होगा. वर्ना इस प्रदुषण से कई नाज़ुक दिल बीमार असमय ही राम के पास पहुँच जायेंगे . क्या बताएँगे श्री राम को उनके प्यारे देश का हाल ! 
लेकिन ये जनता है , कहाँ मानती है. क्या हुआ , ग़र पड़ोसी बीमार है. वैसे भी यहाँ पड़ोसी पड़ोसी बात ही कहाँ करते हैं . भई बम नहीं चलाये तो दिवाली क्या खाक हुई !

ऐसे में क्या सरकार कोई ठोस कदम उठाने का साहस करेगी ?  
क्यों न इस वर्ष दिवाली पर पटाखों पर टोटल बैन लगा दिया जाए !
आखिर, इस वर्ष जिन्दा रहे तो अगले वर्ष फिर दिवाली मना सकते हैं .  

नोट : इस समय स्मॉग दिल्ली तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरे उत्तर भारत में फैली है. इसलिए इससे निपटने का प्रयास सबको मिलकर करना होगा. 


                 

Wednesday, November 7, 2012

नियमित स्वास्थ्य जाँच बहुत आवश्यक होती है ---


बहुत दिनों से अपनी सोसायटी के निवासियों के लिए एक स्वास्थ्य शिविर का आयोजन करने का विचार था। इस रविवार आखिर यह संभव हो ही गया जब फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल के सहयोग से हमने एक हार्ट चेकअप कैम्प का आयोजन किया। इस कैम्प में 100 से ज्यादा लोगों का मुफ्त चेकअप किया गया। शिविर में बी पी , ब्लड सुगर , ई सी जी, पी ऍफ़ टी, और बी एम् डी टेस्ट किये गए।   





मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही सामने है यह मंदिर , हरियाली में घिरा हुआ। यहाँ रोज शाम को भक्तजनों के लिए भगवान के दर्शन हेतु मंदिर के द्वार खोले जाते हैं। यह स्थान महिलाओं विशेषकर वृद्धों के लिए एक अच्छा मिलन स्थान भी है जहाँ वृद्ध महिलाएं शाम को शांत वातावरण में बैठकर कुछ चैन की सांसें ले लेती हैं . 




मंदिर के पीछे एक बहुत बड़ा पार्क है जिसे बड़ी मेहनत और श्रद्धा से हरा भरा बनाया गया है। इस पार्क में करीब 1000 पेड़ पौधे लगाये गए हैं , जिसका श्रेय जाता है सोसायटी के उपाध्यक्ष श्री एम् एन डुडेजा जी को। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हमारे निवासी कटिबद्ध है।  




हमने  कैम्प का आयोजन किया एक ब्लॉक के नीचे पार्किंग जगह पर जिसे खाली करा दिया गया था।  





ठीक दस बजे सब तैयारियां हो चुकी थी। 



रविवार के दिन लोगों को आराम से उठने की आदत होती है। एक एक कर लोग आते रहे और चेकअप करवाते रहे।   


अपनी बारी का इंतजार करते हुए। पीछे बैठे हैं अस्थि रोग विशेषज्ञ।  




खान पान सम्बन्धी जानकारी देने के लिए डाईटीसीयन उपलब्ध थीं।  शहरों में मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या बहुत होती है। शायद इसीलिए सबसे ज्यादा व्यस्त ये ही रहीं।   





बारह बजे के बाद भीड़ काफी बढ़ गई थी। कारडियोलोजिस्ट्स ने सभी के टेस्ट की रिपोर्ट देखकर उसी समय परामर्श देते हुए अपना कार्य पूर्ण किया। 


अंत में सारे स्टाफ को खाना खिलाकर हमने भी विदा ली। और इस तरह यह कार्य सम्पूर्ण हुआ। 

कैम्प का आयोजन रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री नीरज चुग के सौजन्य से हुआ।  


क्यों आवश्यक होते हैं इस तरह के कैम्प्स ? 

बचाव में ही सुरक्षा है . ब्लड प्रेशर , मधुमेह और  हृदय रोग जैसे घातक रोग जो पहले ५०-६० वर्ष की आयु  के बाद होते थे , आजकल बदलती जीवन  शैली के कारण २०-२५ वर्ष की आयु  में भी होने लगे हैं. इनका निदान जितना जल्दी हो जाये , विकारों की सम्भावना उतनी ही कम हो जाती है. इन कैम्पों में स्थानीय निवासियों को घर बैठे ही सभी टेस्ट और सलाह मुफ्त उपलब्ध हो जाती है. इसलिए अक्सर लोग इनका पूरा फायदा उठाते हैं 

आज बात करते  हैं बी एम् डी के बारे में : 

बी एम् डी यानि बॉन मिनरल डेंसिटी -- यह एक ऐसा टेस्ट है जो हमारी हड्डियों में मौजूद कैल्सियम आदि खनिज पदार्थों की कमी के बारे में बताता है. हड्डियों में मजबूती इनमे मौजूद कैल्सियम और फोस्फोरस के मिश्रण की वज़ह से होती है. उम्र के साथ साथ ये खनिज पदार्थ स्वत: कम होने लगते हैं जिससे हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं और टूटने की सम्भावना बढ़ जाती है. आम तौर पर यह स्थिति  महिलाओं में ६५ और पुरुषों में ७० वर्ष के बाद देखने को मिलती है. 

 लेकिन कुछ परिस्तिथियों में यह प्रक्रिया उम्र से पहले ही शुरू हो जाती है जैसे पूर्व में हुआ फ्रक्चर , रयुमेटोइड आरथ्राईटिस , हाइपरपैराथायरायडिज्म , सटीरोइड दवाओं का सेवन और वज़न का अत्यधिक कम होना. इन हालातों में कम उम्र में भी हड्डी कमज़ोर होने की  वज़ह से फ्रक्चर हो सकते हैं. 

इस टेस्ट को करने का सबसे सस्ता और आसान तरीका है -- अल्ट्रासाउंड . हालाँकि एक्स-रे आधारित कई टेस्ट हैं जो बेहतर परिणाम देते हैं. इस टेस्ट के द्वारा हम व्यक्ति की हड्डी के मिनरल कंटेंट का जायज़ा लेते हैं. इसे  टी  और जेड स्कोर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है. टी स्कोर में आपकी हड्डी की ३० वर्ष के व्यक्ति की हड्डी से तुलना की जाती है और जेड स्कोर में सामान आयु के लोगों की तुलना की जाती है. ५० वर्ष की आयु से ऊपर वालों के लिए टी स्कोर लिया जाता है . 

परिणाम : 

स्कोर :        -१ .० से ज्यादा    =   सामान्य  
                  - १.० से -२.५       =  ओस्टियोपिनिया       
                  - २.५ से या कम  =  ओस्टियोपोरोसिस     

ओस्टियोपिनिया :  का अर्थ है , आपकी हड्डियों में कैल्सियम की कमी शुरू हो चुकी है. यदि अभी से सावधानी नहीं बरती गई तो आगे चलकर समस्या खड़ी हो सकती है।  लेकिन घबराने की ज़रुरत नहीं . रोज सुबह शाम सैर करने , कसरत करने और जीवन शैली में परिवर्तन करने से इसे रोका जा सकता है. यदि धूम्रपान करते हैं तो बंद कर दीजिये.  यदि हड्डियों में दर्द लगे तो एक गोली  कैल्सियम एक दिन छोड़कर लेने से आराम मिलेगा.  

ओस्टियोपोरोसिस : 

यह असली समस्या है जिसमे  हड्डियाँ इतनी कमज़ोर हो जाती हैं की ज़रा सी चोट से भी टूट सकती हैं . बुढ़ापे में अक्सर बाथरूम में फिसलकर कूल्हे की हड्डी टूट जाती है जिसका इलाज बड़ा कष्टदायी होता है. इसका इलाज लम्बा और मुश्किल भी होता है. हालाँकि कैल्सियम और विटामिन डी लेने से आराम मिलता है लेकिन और भी कई दवाओं का सेवन करना पड़ता है. यह इलाज डॉक्टर की देख रेख में ही हो सकता है. 

एक पते की बात : उपरोक्त सभी समस्याओं से काफी हद तक बचा सकता है -- रोजाना ३-४ किलोमीटर पैदल चलकर . शहरी जिंदगी में सब कुछ ज्यादा होता है लेकिन पैदल चलना कम से कम होता है . इसीलिए अनेकों विकार उत्पन्न होने लगते हैं .साथ ही दूध और धूप का सेवन ज़रूर करें . दूध से कैल्सियम और धूप से विटामिन डी भरपूर मात्रा में मिलता है.  



नोट : अब अगली बार लोगों की फरमाईश पर नेत्र और ई एन टी कैम्प का आयोजन किया जायेगा। 



Saturday, November 3, 2012

जिंदगी के सफ़र में डगर वही जो मंजिल तक पहुंचाए --


बहुत दिनों से ब्लॉग के हैडर की तस्वीर को बदलने की सोच रहा था. आखिर यह तस्वीर पसंद आई और लगा दी. श्री देवेन्द्र पाण्डेय जी ने पसंद का चटका भी लगा दिया. लेकिन उनका कमेन्ट पढ़कर हमने इस तस्वीर को ध्यान से देखा और जो समझ आया , वह इस प्रकार है : 

* जिंदगी एक सफ़र है. 
* इन्सान राहगीर हैं. 
* जिंदगी के सफ़र की डगर भिन्न भिन्न हैं.
* कोई राह ऊबड़ खाबड़ है तो कोई इस सड़क की तरह साफ और चिकनी सतह वाली. 
* कहीं काँटों भरी राह मिलती है तो कहीं फूलों भरी. 
* कोई राह सीधी होती है , कोई टेढ़ी मेढ़ी . 
* किसी राह पर हमसफ़र मिल जाते हैं , कभी अकेले ही चलना पड़ता है.

अब सवाल यह उठता है -- हम किस राह पर चलें . 

* अक्सर हमें जो राह मिलती है , उस पर हमारा कोई वश नहीं होता. लेकिन एक बार राह पर चल पड़ें तो उसे आसान बनाना हमारे हाथ में अवश्य होता है . 
* यदि राह के बारे में हमारे सामने विकल्प हों तो यह हम पर निर्भर करता है की हम कौन सी राह चुनते हैं. 
* सही राह का चुनना अत्यंत आवश्यक होता है.
* अक्सर राह तो मिल जाती है, लेकिन राह भटकना बड़ा आसान होता है। 
* राह वही जो मंजिल तक पहुंचाए. हालाँकि हमारी मंजिल क्या है , यह समझना बड़ा मुश्किल होता है. 

अंत में यही कहा जा सकता है -- हमारे कर्म ऐसे होने चाहिए की हम जहाँ भी चलें, राह की कठिनाइयाँ स्वयं दूर हो जाएँ , डगर पर सफ़र सुहाना लगे -- जैसा इस तस्वीर को देखकर लग रहा है. 

नोट:  यह तस्वीर कनाडा के टोरंटो शहर के पास एल्गोंक्विन नामक जंगल की है, जिसके मध्य से होकर यह ६० किलोमीटर लम्बी सड़क गुजरती है.