Monday, July 17, 2017

एक कविता ऐसी भी ---


घर में ऐ सी , दफ्तर में ऐ सी ,
गाड़ी भी ऐ सी।
ऐ सी ने कर दी , 'डी'  की ऐसी की तैसी !

चाय का पैसा , पानी का पैसा ,
चाय पानी का पैसा।
जब सब कुछ पैसा , तो ईमान कैसा !

ना जान , ना पहचान ,
बस जान पहचान।
जब यही समाधान , तो कैसा इम्तिहान !

वधु बिन शादी , शादी बिन प्यार ,
बिन शादी के लिव इन यार।
जब ऐसा व्यवहार , तो व्यर्थ संस्कार !

यार मतलब के , मतलब की यारी ,
बिन मतलब के रिश्ते भी भारी।
मतलब ने मति मारी, विमुख दुनिया सारी !  

भ्रष्ट इंसान , रुष्ट भगवान ,
तो बलिष्ठ तूफ़ान।
फिर ध्वस्त मकान , नष्ट सुन्दर ज़हान !

हिन्दू , सिख , ईसाई,  ना मुसलमान ,
बनो इंसान , रखो ईमान।  
फिर जीवन आसान , बने देश महान !  

14 comments:

  1. उतम,अति-उतम
    आपकी लेखनी है सर्वोतम..

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 18 जुलाई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. सुन्दर आह्वान

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  4. बहुत ही सुन्दर ! विचारों को शब्दों में पिरोया है ,आभार। "एकलव्य"

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  5. बढ़िया लिखे हैं


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  6. आजकल समाज की तो तस्वीर कुछ ऐसी ही है....

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  7. बहुत सटीक.....
    लाजवाब....
    वाह!!!!

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  8. आजकल तो यही हाल है, बहुत लाजवाब.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  9. आजकल का हाल यही है आदरणीय --

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  10. भ्रष्ट इंसान , रुष्ट भगवान ,
    तो बलिष्ठ तूफ़ान।
    फिर ध्वस्त मकान , नष्ट सुन्दर ज़हान !

    आज के सत्य को उकेर दिया है ...

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  11. वर्तमान सामाजिक परिवेश का यथार्थपरक चित्रण। भाव-व्यंजना कमाल की है। शानदार प्रस्तुति।

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  12. वर्तमान सामाजिक परिवेश का यथार्थपरक चित्रण। भाव-व्यंजना कमाल की है। शानदार प्रस्तुति।

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